इसी सप्ताह यह डेटा सरकार ने जारी किया है जिससे पता चलता है कि भारत में अब सभी मज़हबों की महिलाएं पहले के मुक़ाबले में कम बच्चे जन्म दे रही हैं.
एनएफएचएस (NHFS) के सर्वे के मुताबिक़ अब सभी धर्मों के लोग पहले के मुक़ाबले में कम बच्चे पैदा करना चाहते हैं. हालांकि मुसलमानों की जन्मदर में गिरावट सबसे तेज़ी से देखी गई है जबकि दूसरे धर्मों से यह ज्यादा है.
2015-16 में हुए चौथे नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे और 2019-20 में हुए चौथे NFHS सर्वे के बीच में फर्टिलिटी रेट में काफी अंतर नज़र आया है. इसी सप्ताह यह डेटा सरकार ने जारी किया है जिससे पता चलता है कि भारत में अब सभी मज़हबों की महिलाएं पहले के मुक़ाबले में कम बच्चे जन्म दे रही हैं. देश में फर्टिलिटी रेट लगातार कम हो रहा है. एक महिला अपनी ज़िंदगी में जितने बच्चों को जन्म देती है उसके औसत को फर्टिलिटी रेट कहते हैं.
एनएचएफएस सर्वे
पहली बार 1992-93 में यह सर्वे हुआ था. तब से अब तक टोटल फर्टिलिटी रेट में 40 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. उस समय फर्टिलिटी रेट 3.40 थी, और अब ये दर कम होकर 2.0 रह गई है. यह रेट रिप्लेसमेंट लेवल से भी कम है. रिप्लेसमेंट लेवल उस औसत को कहते हैं जिसपर जनसंख्या स्थिर हो जाती है.
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे का डेटा बताता है कि मुस्लिमों के अलावा दूसरे बडे़ धार्मिक समुदायों में टोटल फर्टिलिटी रेट रिप्लेसमेंट लेवल से कम हो गया है. वहीं मुस्लिमों में फर्टिलिटी रेट कम होने के बावजूद यह रिप्लेसमेंट लेवल से ऊपर है. अब तक पांच बार एनएफएचएस का सर्वे हो चुका है. इतने सालों में मुस्लिमों का टीआरएफ 46.5 फीसदी और हिंदुओं का 41.2 फीसदी कम हो चुका है.
मुस्लिमों में फर्टिलिटी रेट की सबसे तेज़ी गिरावट
आंकड़े से पता चलता है कि जिस समुदाय के लोग पहले ज़्यादा बच्चे पैदा करते थे उनकी फर्टिलिटी रेट में गिरावट भी उसी तरह ज़्यादा तेज़ी से आई है. मुस्लिम तबक़ा में सबसे ज़्यादा 9.9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. यह 2.62 से घटकर 2.36 हो गई है.
यह भी बात ध्यान देने योग्य है कि एक ही समुदाय में कई बार अलग-अलग राज्यों में टोटल फर्टिलिटी रेट में अंतर आ जाता है. अगर उत्तर प्रदेश की बात करें कतो हिंदुओं का टोटल फर्टिलिटी रेट 2.29 फीसदी है. वहीं तमिलनाडु में इसी धर्म समूह का टीआरएफ 1.75 है. इसी तरह यूपी में मुस्लिमों का टीआरएफ 2.6 है तो तमिलनाडु में 1.93 है जो कि रिप्लेसमेंट रेट से कम है.
फर्टिलिटी डेटा से ये भी पता चलता है कि बच्चों की संख्या का सीधा संबंध मां की शिक्षा से भी है. मुस्लिमों में 15 से 49 साल की महिलाओं में 31.49 फीसदी महिलाएं अशिक्षित हैं और सिर्फ 44 फीसदी ऐसी हैं जिन्होने स्कूली शिक्षा पूरी की है. वहीं हिंदुओं में यह आंकड़ा 27.6 फीसदी और 53 फीसदी का है.

