ज़मीन माफ़िया की साज़िश बताई जा रही है कि अगर नदी के बहाओ को रोक दिया जाए तो फ़सलों की बर्बादी होगी और जब हर साल किसानों की फ़सलें बर्बाद होने लगेंगी तो किसान ज़्यादा समय तक नुक़सान बर्दाश्त नहीं कर सकेंगे.
किशनगंज: ज़िला किशनगंज बिहार के फरिंगगोड़ा से एक प्राचीन सुधा नदी बहती है जो किशनगंज से होकर पश्चिम बंगाल के रास्ते बांग्लादेश की सीमा तक जाने वाली पक्की सड़क के किनारे अवस्थित है.
यह नदी बिहार और पश्चिम बंगाल राज्यों को अलग करने वाली सीमा रेखा का भी काम करती है.
यह सुधा नदी पहले काफी गहरी और तेज़ धार से बहती थी लेकिन अब ना तो यह ज़्यादा गहरी है और ना ही इसमें पहले जैसा पानी का बहाव है.
किशनगंज टाउन से पूरब सुधा नदी ही एक वाहिद नदी है जो तक़रीबन हर साल सैलाब के पानी को अपनी तरफ़ खेचती लेती है जिससे धान और दूसरी फ़सल पानी में डूबने से बच जाती है और फ़सलों को ज़्यादा नुक़सान नहीं पहुंचता.
अब ज़मीन माफ़ियाओं की एक साज़िश बताई जा रही है कि किसी भी तरह अगर नदी के लगातार बहाओ को रोक दिया जाए तो सबसे पहले फ़सलों की बर्बादी होगी और जब हर साल किसानों की फ़सलें बर्बाद होने लगेंगी तो उस जगह से संबद्ध छोटे छोटे किसान ज़्यादा समय तक नुक़सान बर्दाश्त नहीं कर सकेंगे.
इससे कर्ज़ के बोझ तले दब कर अपने घर परिवार को चलाने के लिए अपनी ज़मीनों को बेचना शुरू कर देंगे, जिसे चंद बिचौलियों और ज़मीन के दलालों की मदद से ऐसे पूँजीपतियों को बेच दी जाएंगी जो अभी नदी की धार के वजूद को मिटाने की कोशिशों में लगे हुए हैं.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) किशनगंज के नेता फिरोज़ आलम के अनुसार धर्मशाला, गौशाला, रेलवे, भूदान, बिहार सरकार की जमीन से लेकर स्कूल, कॉलेज, मठों, मन्दिर, कब्रिस्तान, वक़्फ़बोर्ड व नदियों की ज़मीन को पैसों की ताक़त पर हड़पकर ख़रीद बिक्री करने में लगे किशनगंज के ज़मीन माफ़ियाओं को न सरकार का डर है और न ही स्थानीय प्रशासन का डर है.
अब ज़िला किशनगंज के ओहदेदारों और राजनैतिक आसरो रसूख रखने वाले ज़मीन माफ़ियाओं से लड़ने के लिए अवाम ने अपना मन बनाना शुरू कर दिया है.
इस मामले में फिरोज़ आलम और उनके कार्यकर्ताओं ने पहल करने की तैयारी शुरू कर दी है.
किशनगंज ज़िला मुख्यालय में समाज सेवी सरगर्म नेता फिरोज़ आलम का कहना है कि किशनगंज में धन्ना सेठ ज़मीन माफ़ियाओं का उत्पात दिनप्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है.
उनका कहना है कि ज़मीन माफ़ियाओं की मनमानी के खिलाफ़ प्रशासन को आवेदन और निवेदन देने का सिलसिला बेकार साबित हो रहा है और प्रशासन से जनता का भरोसा अब विल्कुल ही समाप्त हो रहा है. इसलिए हमें अब अपनी ज़मीन और अनाज बचाने की लड़ाई हमें खुद ही लड़नी होगी. इसके अलावा कोई और चारा नहीं बचा है.
बताया जाता है कि किशनगंज शहर के आसपास पूंजीपतियों द्वारा छोटे छोटे किसानों के खिलाफ़ एक बड़ी साज़िश रची जा रही है और इसके लिए माफ़ियाओं ने एक खाका तैयार कर रखा है.
फिरोज़ आलम के अनुसार किशनगंज के पूंजीपति व भू माफ़िया इस भ्रम में है कि स्थानीय जनता व किसान इस साज़िश को नहीं समझते हैं और जबतक समझेंगे, तब तक बिचौलियों की मदद से किसानों की ज़मीन को कौड़ी के दाम पर ख़रीद लेंगे.
इससे पहले किशनगंज ही की रमज़ान नदी भी इन्ही ज़मीन माफ़ियाओं की शिकार हो चुकी है जो पहले कभी खूबसूरती के साथ शहर के बीचों बीच बहती थी लेकिन आज इनकरोंचर्स और ज़मीन माफ़िया की मिलीभगत से नदी की बजाय नाले का रूप ले चुकी है.
विरोध में पब्लिक की आवाज़ें उठती रही हैं पर अमीरों के दबदबे में पब्लिक की आवाज़ें दब जाती हैं या दबा दी जाती हैं.
कुछ इसी तरह की हरकत सुधा नदी के साथ भी करने की तैयारी में अब ज़मीन माफ़िया लग गए हैं.
