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Wednesday, January 21, 2026

इस्लामी शासन व्यवस्था और राजशाही व्यवस्था के बीच का अंतर

इंडियाइस्लामी शासन व्यवस्था और राजशाही व्यवस्था के बीच का अंतर

खिलाफत-ए-रशीदा के अंत के साथ, मुस्लिम-बहुल देशों में रोमन राजाओं, ईरानी सम्राटों और भारतीय शासकों के समान ही व्यवस्था प्रचलित थी।

इस भाग में हम आप को अपने वादे के मुताबिक़ इस्लामी शासन प्रणाली और राज शाही के बीच का फ़र्क़ बताएंगे। । जब पैगंबर हज़रत मोहम्मद को एक विशाल देश का कार्यभार संभालना पड़ा तो उन्होंने किसी बादशाह, शहंशाह या राजा की तरह शासन नहीं किया बल्कि दुनिया के सामने शासक का एक ऐसा रूप पेश किया जिसमें करुणा, दया, इंसानियत और सज्जनता शामिल थी। उन्होंने एक विशाल देश का शासक बनने के बाद भी अपने रहने सहने और अपनी जीवन पद्यति में कोई परिवर्तन नहीं किया।

उन्होंने अपने या अपने परिवार के रहने के लिए ना तो कोई महल बनवाया, ना दरबार सजाया ना अपनी सुरक्षा के लिए अंगरक्षक तैनात किये, ना कोई सेना बनाई, ना हीरे जवाहरात वाला ताज पहना और ना अपनी वेश भूषा बदली। काँधे पर एक काली कमली बदन पर एक सादा सा लिबास, पवित्र पैरों में एक पुराना जूता और हाथों में एक इस्लामी राज्य की बागडोर इतनी ही थी पहचान उस शासक की जो इंसानों को सत्य मार्ग पर चलने का निमंत्रण देने के लिए धरती पर उतारा गया था। पैगंबर साहिब की बनवाई हुई मस्जिद में कच्ची दीवारों पर खजूर के पत्तों की छत पड़ी थी और उसी में बैठ कर हज़रत मोहम्मद अपनी रणनीति बनाते थे उपदेश देते थे और नमाज़ पढ़ाते थे, उनकी कोई सेना नहीं थी, जब कोई हमला होता तो उसका मुक़ाबला करने के लिए मुसलमानों को एकत्रित होने का आह्वान किया जाता था और मदीना नगर में या उस के बाहर एक मैदान में झंडा लगा दिया जाता था जिस के बाद योद्धा वहाँ जमा होने लगते थे।

पैगंबर हज़रत मोहम्मद के निधन के बाद शासन की एक ऐसी इस्लामी प्रणाली से दुनिया अवगत हुई। जिसको
ख़िलाफ़त ए राशिदा का नाम दिया गया। इस प्रणाली में ख़लीफ़ा (शासक) एक आदमी की जैसा जीवन वयतीत करता था। ख़लीफ़ा का घर, लिबास और रहन सहन सादा होता था और वह बिना अंग रक्षकों के आम आदमियों की तरह ज़िंदगी गुज़ारता था। ख़लीफ़ा को भी बैतुल माल (सरकारी खज़ाने) से उतना ही वेतन मिलता था जो एक आदमी को मिलने वाली मज़दूरी के बराबर होता था, मगर चौथे ख़लीफ़ा हज़रत अली की शहादत के बाद ख़िलाफ़त ए राशिदा का समापन हो गया।

ख़िलाफ़त ए राशिदा ख़त्म होते ही मुस्लिम बाहुल्य देशों में वैसी ही प्रणाली चल पड़ी जैसी कि रोमन किंग्स, ईरानी शहंशाहों और भारतीय राजाओं में चल रही थी। मुसलमान बादशाह भी बड़े बड़े महल बना कर रहने लगे, सोने चांदी के आभूषण और महंगे लिबास को शासक की पहचान समझा जाने लगा। दरबार सजने लगे, ऊँचे वेतन पर फौजी अफसर और सैनिक रखे जाने लगे, दरबार सजने लगे, भव्य मस्जिदें बनाने का चलन भी शुरू हो गया। कई शाही परिवारों ने अपने नाम के आगे ख़िलाफ़त का शब्द लगा कर भोले भाले मुसलमानों को गुमराह करने का प्रयास किया मगर उनको किसी मुसलमान ने ख़लीफ़ा का वास्तविक दर्जा नहीं दिया बल्कि एक शासक से अधिक कुछ नहीं समझा।

जब ख़िलाफ़त की नक़ाब ओढ़ कर बादशाह और शहंशाह मुस्लिम देशों पर शासन करने लगे तो सिर्फ शासक और जनता के बीच दूरी पैदा हो गई और दरबार तक आम लोगों की पहुंच मुश्किल हो गई और फिर जिस शासक को जितनी ताक़त मिली वह उस के सहारे अपने राज्य को विकसित करने का काम करने लगा। जबकि यह आचरण पैगंबर साहिब के आचरण के बिलकुल विपरीत था पैगंबर साहब ने अपने जीवन काल में किसी देश पर हमला नहीं किया, उन्होंने केवल अपने राज की सीमाओं की सुरक्षा करने के लिए ही लड़ाइयां लड़ीं।

पैगंबर साहिब के निधन को 40 वर्ष भी पूरे नहीं हुए थे कि इस्लामी शासन को राज शाही में परिवर्तित किये जाने के लिए ख़िलाफ़त ए राशिदा के सिस्टम पर हमले होने लगे जिस के कारण मुसलमानों को विनाशकारी युद्धों का सामना करना पड़ा और हज़रत अली की शहादत के साथ ही इस्लामी शासन प्रणाली पूरी तरह ख़त्म हो गई और फिर बनी उमय्या की बादशाहत स्थापित हो गई जिसकी सब से बड़ी क़ीमत पैगंबर हज़रत मोहम्मद के परिवारजनों को ही चुकानी पढ़ी।

हज़रत मोहम्मद की हिजरत के केवल साठ वर्ष बाद सीरिया के शासक यज़ीद की विशाल सेना ने ईराक़ के कर्बला नामक स्थान पर पैगंबर साहिब के नवासे और अन्य परिवारजनों की निर्मम रूप से हत्या कर दी। इन सब बातों को सुन कर आप आसानी से समझ सकते हैं कि वह बादशाह दूसरे धर्म का क्या सम्मान करेंगे जो अपने ही धर्म के संस्थापक के परिवारजनों को शहीद करने में संकोच ना करते हों? इस भाग के अंत में बताते चलें कि इमाम हुसैन की जघन्य हत्या के बाद उमय्या वंश के शासक यज़ीद को हज़रत मुख़्तार सक़फ़ी और हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर के विद्रोह का सामना करना पड़ा। कहा जाता है कि हज़रत मुख़्तार की सेनाओं के साथ मिल कर भारतीयों का एक दस्ता भी यज़ीद की सेनाओं से टकराया था। इस दस्ते के बारे में हम आप को अगले भाग में जानकारी देंगे। (जारी)

1 – पहला भाग

2 – दूसरा भाग

3 – तीसरा भाग

4 – चौथा भाग

5 – पांचवां भाग

6 – छठा भाग

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