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Wednesday, January 21, 2026

किशनगंज बिहार का सबसे ग़रीब जिला और सीमांचल सबसे ग़रीब क्षेत्र: नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट

अर्थव्यवस्थाकिशनगंज बिहार का सबसे ग़रीब जिला और सीमांचल सबसे ग़रीब क्षेत्र: नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट

नीति आयोग की रिपोर्ट में किशनगंज को सबसे गरीब स्तरीय जिला घोषित किए जाने के बाद क्षेत्र में गरीबी और पिछली कई सरकारों की छेत्र के साथ सौतेले रवैये की एक बार फिर चर्चा होने लगी है.

लेख: जलीस अख्तर नसीरी

नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, किशनगंज  और सीमांचल के कई ज़िला के बारे में जो बात कही गई है हालांकि वह बहुत अधिक चौंकाने वाली नहीं है लेकिन बेहद अफसोसनाक जरूर है. इस रिपोर्ट में किशनगंज जिले को बिहार का सबसे गरीब जिला बताया गया है.

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार के 38 जिलों में सबसे गरीब किशनगंज जिला है. नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार के पांच जिलों के 60 फीसदी लोग संपन्न वर्ग के हैं जबकि इनमें से 11 जिलों में 60 फीसदी से ज्यादा लोग गरीब हैं.

सीमांचल का किशनगंज जिला जहां बहुसंख्यक आबादी अल्पसंख्यक समुदाय की है, वहां 64.75 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) जीवन-यापन कर रहे हैं. किशनगंज के बाद अररिया में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या 64.65 फीसदी, मधापुरा जिले में 64.43 फीसदी, पूर्वी चंपारण में 64.13 फीसदी, सुपौल में 64.01 फीसदी, जमुई में 64.01 फीसदी, सीतामढ़ी और पूर्णिया में 63.29 फीसदी है, कटिहार 62.80 फीसदी, सहरसा 61.48 फीसदी और शिवहर में 60.30 फीसदी है.

उपरोक्त जिलों के अलावा गरीबों की श्रेणी में आने वाले 50 फीसदी लोग मुंगेर जिला के हैं जहां गरीबों की संख्या 40.99 फीसदी, रोहतास 40.75 फीसदी, सीवान 40.55 फीसदी और भोजपुर 40.50 फीसदी है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि पटना जिला बिहार का एक ऐसा ज़िला है जहाँ सबसे अमीर लोग रहते हैं. नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक पटना में रहने वाले 29.20 फीसदी लोग अमीरों की श्रेणी में आते हैं. पटना के बाद मुजफ्फरपुर, गया और भागलपुर जिले हैं जहां अमीर लोगों की संख्या सबसे अधिक है.

रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को निशाना साधते हुए कहा है कि नीतीश कुमार को खुद पर शर्म आनी चाहिए क्योंकि बिहार शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबी सहित हर क्षेत्र में पीछे है.

श्री लालू प्रसाद ने जो कहा है उसे तो हद तक सही माना जा सकता है कि बिहार जीवन के लगभग हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है लेकिन इसके लिए अकेले नीतीश कुमार की आलोचना करना सही नहीं है, क्योंकि राज्य में विकास कार्य पहले से ही अप्रत्याशित हैं और सीमांचल का वह क्षेत्र जहां सबसे गरीब जिला किशनगंज सबसे अधिक प्रभावित है. हालांकि, किशनगंज एक ऐसे क्षेत्र में स्थित है जिसका भौगोलिक महत्व बहुत ज़्यादा है. जैसे परिवहन का कोई समस्या यहाँ पर नहीं है. राष्ट्रीय राजमार्ग किशनगंज के बीच से होकर गुजरता है जो देश के अधिकांश वाणिज्यिक क्षेत्रों और शहरों तक पहुंच की सुविधा प्रदान करता है. बागडोगरा हवाई अड्डा भी बहुत करीब है. इसके अलावा कई विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल जैसे दार्जिलिंग, सिक्किम, मिरिक और गेंगटोक भी 2 से 3 घंटे की दूरी पर स्थित हैं.

उत्पादन के मामले में किशनगंज में धान, गेहूं, जूट से लेकर चाय तक की खेती होती है, लेकिन किसानों की स्थिति हमेशा खराब रहती है. जिसके बारे में वर्षों से बात की जा रही है, लेकिन किसानों को उनके उपजाओ का सही मूल्य न मिलने के कारण उनकी स्थिति सिर्फ जीवन बीताने भर की है.

पिछले विधानसभा चुनाव में सीमांचल की जनता में अपने पुराने जनप्रतिनिधियों के प्रति काफी आक्रोश नज़र आया था, जहां विधानसभा के पुराने सदस्यों को हार का सामना करना पड़ा और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी मजलिस-ए-इत्तेहाद-ए-मुस्लिमीन के उम्मीदवारों को विधानसभा क्षेत्रों में शानदार जीत हासिल हुई थी.

इस विधानसभा चुनाव से पहले, मीडिया ने केवल मुद्दे पर भी ध्यान केंद्रित किया कि यहां के मतदाता का रुझान ओवैसी की पार्टी की ओर क्यों न हो और वे इसे एक विकल्प के रूप में न देखें. हालाँकि, मीडिया को उन कारणों पर भी विचार करने और उनकी तरफ़ तवज्जो देने की आवश्यकता थी कि क्यों कांग्रेस या राष्ट्रीय जनता दल जैसी सेकुलर होने का दावा करने वाली पार्टियों ने क्षेत्र में विकास कार्यों पर थोड़ा भी ध्यान देने की कोशिश नहीं की.

किशनगंज एक ऐसा जिला है जहां पूरे इलाके में एक ही सरकारी अस्पताल है जहां 100 से ज्यादा लोगों का इलाज संभव नहीं है. अन्य कुछ ब्लॉक स्तर के रेफरल अस्पताल हैं, जिनमें से अधिकांश कागज पर चल रहे हैं. पूरे जिले में लगभग कोई कॉलेज या अन्य सरकारी शिक्षण संस्थान नहीं है.

अब यह स्पष्ट है कि किशनगंज को जिस कगार पर लाया गया वह एक या दो साल में नहीं हुआ है, बल्कि राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की स्थायी अक्षमता का ये खुला नतीजा है.

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