सोशल मीडिया पर वायरल एक क्लिप दिखाती है कि आज के बच्चे ज्ञान से ज़्यादा आत्मविश्वासी हैं, मगर विनम्रता और धैर्य से वंचित।
मैं अब टेलीविज़न नहीं देखता। वहाँ देखने लायक कुछ बचा ही नहीं। जो कभी जानकारी देता था अब मनोरंजन करता है, और जो कभी ज्ञान देता था अब प्रदर्शन करता है। न्यूज़ एंकर चिल्लाते हैं, डिबेट्स हंगामे में बदल जाती हैं, और “रियलिटी शो” भावनाओं को ऐसे बेचते हैं जैसे कोई सामान। मगर विडंबना यह है कि हम टीवी देखना छोड़ दें, फिर भी टीवी हमें नहीं छोड़ता। सोशल मीडिया वही शोर हमारी स्क्रीन तक पहुँचा देता है।
इसी तरह मेरी नज़र कौन बनेगा करोड़पति के एक वायरल क्लिप पर पड़ी। एक छोटा लड़का, मुश्किल से दस साल का, अमिताभ बच्चन के सामने बैठा था, और उसके लहजे में ऐसा अहंकार था कि बड़े भी शर्मा जाएँ। उसने कहा, “मैं रूल्स जानता हूँ, मत समझाइए।” फिर बोला, “मुझे ऑप्शन्स की ज़रूरत नहीं, जवाब मुझे पता है।” और जब जवाब ग़लत निकला तो कहा, “लॉक कीजिए सर, चार बार लॉक कीजिए।”
देश पहले हँसा, फिर नाराज़ हुआ, और फिर नैतिकता का उपदेश देने लगा। मगर इस हंगामे के नीचे एक आईना है – जो दिखाता है कि हमने अपने बच्चों को क्या बना दिया है।
यह बच्चा कोई अपवाद नहीं, बल्कि “सिक्स पॉकेट सिंड्रोम” का जीता-जागता उदाहरण है। छह जेबें — माँ-बाप, नाना-नानी, दादा-दादी – सबका प्यार और पैसा एक ही बच्चे पर लुटाया गया। वह समृद्धि में बड़ा हुआ लेकिन धैर्य और कृतज्ञता से खाली। कमाता कुछ नहीं, मगर हुक्म सब पर चलाता है। उसके लिए सम्मान कोई अर्जित चीज़ नहीं, बल्कि उसका “हक़” है।
आज की जेन ज़ी और आने वाली “अल्फा” पीढ़ी डिजिटल युग की संतान है। वे किताबें नहीं पढ़ते, स्क्रॉल करते हैं। सुनते नहीं, बोलते हैं। सिखते नहीं, दिखाते हैं। उनके हीरो लिखते नहीं, पोस्ट करते हैं। उन्हें सिखाया गया है कि आत्मविश्वास ही सब कुछ है – इसलिए वे उसे दिखाते हैं, चाहे अंदर से खोखला क्यों न हो। विनम्रता उन्हें पुरानी लगती है, और धैर्य कमज़ोरी।
यह सिर्फ़ बदतमीज़ी नहीं, बल्कि समय की बीमारी है – कृत्रिम आत्मविश्वास का युग। हर “लाइक”, हर “कमेंट”, हर “फॉलोअर” उन्हें यह भ्रम देता है कि वे मायने रखते हैं। KBC का वह बच्चा असल में अमिताभ बच्चन से नहीं, बल्कि अपने मोबाइल में बसे काल्पनिक दर्शकों से बात कर रहा था। वह अशिष्ट नहीं बनना चाहता था, बस “वायरल” होना चाहता था।
लेकिन दोष सिर्फ़ उसका नहीं, हमारा भी है। हम बड़ों का, जिन्होंने शिक्षा को परवरिश समझ लिया। हमने अच्छे स्कूल और महंगे गैजेट्स तो दिए, पर संस्कार नहीं। हमने ऐसी पीढ़ी तैयार की जो बहस तो कर सकती है, पर सुन नहीं सकती; जो ज्ञान दोहरा सकती है, पर आदर नहीं दिखा सकती।
मीडिया भी निर्दोष नहीं। वह परिपक्वता के बिना चालाकी को, और चरित्र के बिना होशियारी को सराहता है। हर शो “वायरल मोमेंट” चाहता है, सार्थक सबक नहीं।
अमिताभ बच्चन का उस समय का धैर्य किसी प्रवचन से ज़्यादा प्रभावी था। उन्होंने कहा, “कभी-कभी बच्चे ज़्यादा आत्मविश्वास के कारण गलती कर बैठते हैं।” यह वाक्य पूरी पीढ़ी के लिए संदेश है।
सच यह है कि हमारे बच्चे जानकारी में धनी हैं, पर चिंतन में निर्धन। उनके पास सब कुछ है, सिवाय ठहरने की क्षमता के। KBC का यह प्रसंग किसी बच्चे की बदतमीज़ी नहीं, बल्कि उस समाज की झलक है जो शोर को समझ पर प्राथमिकता देता है।
हम ऐसी पीढ़ी पाल रहे हैं जिनकी छह जेबें भरी हैं, मगर ज़मीर खाली। हम उन्हें जीतना सिखा रहे हैं, हारना नहीं। हम उन्हें महत्वाकांक्षा दे रहे हैं, पर संवेदना नहीं।
शायद एक दिन हम समझेंगे कि मक़सद एक और करोड़पति बनाना नहीं, बल्कि एक और इंसान बनाना है। असली सवाल यह नहीं कि कौन बनेगा करोड़पति – बल्कि यह है कि कौन रहेगा इंसान।

