बढ़ते तापमान के बीच चिंता के बादल: भारत की तैयारियों का किया गया विश्लेषण
मार्च के महीने में भीषण गर्मी से जूझते भारत के बड़े हिस्से को अब तक पहली हीटवेव का सामना करना पड़ा है। दिल्ली स्थित सस्टेनेबल फ्यूचर्स कोलैबोरेटिव (एसएफसी) की रिपोर्ट के अनुसार, इस साल की पहली हीटवेव 25 फरवरी को गोवा और महाराष्ट्र में दर्ज की गई, जो भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा परिभाषित सर्दियों के दौरान आनेवाली पहली हीटवेव है। रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2025 का महीना अब तक का सबसे गर्म महीना साबित हुआ है।
गर्मी का यह दौर अब सिर्फ दिन के तापमान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रात के तापमान में भी काफी वृद्धि देखी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे न केवल लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ेगा, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था पर भी कुप्रभाव डाल सकता है। ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि भारत इस बढ़ती गर्मी के मुकाबले कितनी तैयारियों में है।
गर्मी का स्वास्थ्य पर प्रभाव और असुरक्षित श्रमिक
बढ़ते तापमान के बीच कामकाजी आबादी विशेष रूप से असुरक्षित होती जा रही है। किसान, निर्माण मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले और अन्य ऐसे मजदूर जो धूप में लंबे समय तक काम करते हैं, उनके लिए यह स्थिति काफी चिंताजनक है। हालांकि गर्मी का यह मुद्दा राजनीतिक रूप से कोई चुनावी मुद्दा नहीं बना है, लेकिन इसके स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और सामाजिक असमानताओं पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
दिल्ली स्थित एसएफसी की रिपोर्ट ने नौ शहरों में दीर्घकालिक ताप जोखिम न्यूनीकरण उपायों की क्रियान्वयन का आकलन किया है। इसमें बंगलूरू, फरीदाबाद, ग्वालियर, कोटा, लुधियाना, मेरठ, मुंबई, नई दिल्ली और सूरत जैसे शहर शामिल हैं। ये शहर भारत की शहरी आबादी के 11 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं।
निजी और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर असर
रिपोर्ट के अनुसार, गर्मी के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों में वृद्धि हो रही है। और अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि गर्मी के कारण संभावित मृत्यु दर में बढ़ोतरी हो सकती है। इससे न केवल कृषि उत्पादकता कम हो सकती है, बल्कि यह भीषण गर्मी लाखों नौकरियों के लिए खतरा उत्पन्न कर सकती है।
जिन शहरों में गर्मी की स्थिति अधिक खराब है, वहां स्वास्थ्य आपदा प्रबंधन, श्रम और बागवानी जैसे विभिन्न विभागों के अधिकारियों के साथ 88 साक्षात्कार किए गए थे। ये साक्षात्कार रिपोर्ट में विभिन्न नीतियों के कार्यान्वयन का आकलन करने में मददगार रहे हैं।
आवश्यक उपाय और दीर्घकालिक योजनाएं
रिपोर्ट में अहमदाबाद नगर निगम द्वारा बनाई गई पहली हीट एक्शन प्लान (एचएपी) का भी उल्लेख किया गया है, जिसे 2013 में लागू किया गया था। इससे पहले, 2010 में शहर में घातक लू से 1,300 से अधिक लोग मारे गए थे। इस साल कई भारतीय शहरों में एचएपी लागू हो चुका है, जिससे जान-माल की हानि कम हुई है।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि अब तक की क्रियान्वयन प्रक्रिया अल्पकालिक प्रतिक्रिया उपायों पर केंद्रित रही है। इससे दीर्घकालिक उपायों की कमी दिखाई दे रही है, जैसे कि काम के घंटे में कमी, कार्य समय में परिवर्तन, और शीतलन केंद्रों का निर्माण।
हाल ही में एक अध्ययन ने सुझाव दिया है कि भारत के गर्म शहरों में दीर्घकालिक उपायों की आवश्यकता है। जैसे कि रोजगार के लिए बीमा की व्यवस्था और बिजली की मांग को पूरा करने के लिए ग्रिड में सुधार। इससे न केवल गर्मी में कार्यरत मजदूरों को राहत मिलेगी, बल्कि उनके स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
रुकी हुई विकास की रफ्तार
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, यदि ऐसे ही हालात बने रहे, तो 2030 तक भारत के कार्य घंटों में 5.8 प्रतिशत की कमी आ सकती है, जो 3.4 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों के बराबर है। इससे स्वास्थ्य खर्च में वृद्धि और वेतन कटौती जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। इससे गरीब और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का जीवन और भी कठिन हो जाएगा।
स्वास्थ्य और संरक्षण की नीति
सरकार को चाहिए कि वह ऐसे उपायों पर ध्यान केंद्रित करे जो दीर्घकालिक हैं और श्रमिकों की सुरक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य खर्च को भी नियंत्रित कर सकें। इसके लिए सरकार को विशेष सब्सिडी और वित्तीय सहायता योजनाएं लागू करनी चाहिए, ताकि मजदूरों को सुरक्षित और प्रभावी स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें।
इस स्थिति पर ध्यान देने के लिए आवश्यक है कि सभी संबंधित विभाग और नीति निर्माता मिलकर काम करें, ताकि भारत एक ठोस योजना बना सके, जो न केवल गर्मियों में गर्मी से प्रभावित लोगों की रक्षा कर सके, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान कर सके।
नवीनतम रिपोर्टों के लिए पढ़ें:[दैनिक भास्कर](https://www.bhaskar.com) और[इंडिया टुडे](https://www.indiatoday.in)।
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