अलीगढ़ में भाजपा नेता रघुराज सिंह का विवादित बयान, तिरपाल पहनकर रंगों से बचने की सलाह
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में भाजपा नेता और उत्तर प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष रघुराज सिंह ने होली और जुमे के एक ही दिन पड़ने को लेकर एक विवादित बयान दिया है। उन्होंने दावा किया है कि जो लोग होली के रंगों से बचना चाहते हैं, उन्हें तिरपाल का हिजाब पहनना चाहिए। इस बयान ने प्रदेश में एक बार फिर से राजनीतिक हलचल मचा दी है।
इस वर्ष होली का पर्व और जुमे का दिन एक ही दिन यानी 8 मार्च 2025 को आ रहा है। इससे पहले ही रघुराज सिंह का यह बयान गरमागरम चर्चाओं का विषय बन गया है। उन्होंने कहा, “यदि आप होली के दौरान रंगों से बचना चाहते हैं, तो तिरपाल का हिजाब पहनकर घर से बाहर निकलें।” उनके अनुसार, रंग डालते समय लोग यह नहीं देखते कि रंग कितनी दूर तक जाएगा, इसलिए सफेद टोपी और कपड़े पहनने वाले लोगों को इस स्थिति से बचने के लिए विशेष ध्यान देना चाहिए।
तिरपाल का हिजाब: एक सुझाव या विवाद?
रघुराज सिंह के इस बयान पर समाज के विभिन्न वर्गों की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। कई लोग इसे समाज में बढ़ते धार्मिक तनाव का प्रतीक मान रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे केवल एक सुझाव के रूप में देख रहे हैं। उन्होंने बयान में यह भी जोड़ते हुए कहा कि होली खेलने वाले रंग डालते समय यह नहीं देखते कि रंग किस पर पड़ रहा है।
सिंह ने यह भी कहा, “आप देख सकते हैं कि जैसे मस्जिदों को होली के दौरान तिरपाल से ढका जाता है, वैसे ही नमाजी भी तिरपाल का हिजाब पहनकर घर से बाहर निकल सकते हैं।” उन्होंने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहा कि जरूरत पड़ने पर उन्हें एएमयू (अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी) में राम मंदिर बनाने के लिए पूरी संपत्ति लगाने में भी कोई संकोच नहीं होगा।
राजनीति और धर्म: एक संवेदनशील मुद्दा
इस बयान ने राजनीतिक सर्कलों में एक नई बहस को जन्म दिया है। कई राजनीतिज्ञ इसे चुनावी रणनीति के तहत समाज में उत्तेजना फैलाने का प्रयास मानते हैं। भाजपा नेता के इस बयान पर यूपी में सामाजिक संगठनों की भी प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। कुछ संगठनों ने इसे “धार्मिक राजनीति” की एक चाल बताया है, जबकि कुछ लोगों ने इसे केवल एक मजाक के रूप में लिया है।
उन्हें तिरपाल का हिजाब पहनने को लेकर दिए गए सुझाव ने व्यापक रूप से चर्चा का विषय बना दिया है। क्या इस तरह के बयानों का समाज पर कोई सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, या यह केवल विभाजन को बढ़ावा देते हैं? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब देना अभी बाकी है।
इस महामारी के दौर में तनाव का कारक
कोविड-19 महामारी के बाद सामाजिक स्थिरता और सामूहिक सौहार्द बनाए रखना और भी कठिन हो गया है। ऐसे में रघुराज सिंह का यह बयान एक नई बहस को जन्म दे गया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि समाज में धार्मिक सौहार्द बनाए रखने के लिए सभी को संवेदनशीलता के साथ कार्य करना आवश्यक है।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में राम मंदिर बनाने की बात भी इस विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। रघुराज सिंह ने कहा कि वे इस कार्य के लिए पहली ईंट भी खुद रखेंगे। यह बयान भी कई सवाल उत्पन्न करता है: क्या धार्मिक स्थलों का निर्माण राजनीतिक उद्देश्य के लिए किया जाना चाहिए? या फिर इसे सामाजिक एकता का प्रयास मानना चाहिए?
समाज में भिन्न प्रतिक्रियाएँ
रघुराज सिंह के इस बयान पर विभिन्न समुदायों के लोगों ने अपनी-अपनी राय दी है। कुछ लोग इसे एक सकारात्मक बदलाव के रूप में देख रहे हैं, जहां धार्मिक उत्थान के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। वहीं, कुछ लोग इसे धार्मिक तनाव बढ़ाने का एक प्रयास मानते हैं।
कई युवाओं और सामाजिक संगठनों ने इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि इस प्रकार के बयान केवल समाज में विभाजन करने का कार्य करते हैं। उन्हें लगता है कि अल्पसंख्यक समुदाय को इस तरह के बयानों से कोई सकारात्मक संदेश नहीं जाता।
अंत में
उत्तर प्रदेश में जो हलचल रघुराज सिंह के इस बयान से हुई है, वह यह साबित करती है कि राजनीति और धर्म के बीच की रेखा कितनी बारीक हो सकती है। हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि एक समाज को एकजुट रखने के लिए सभी धर्मों का सम्मान और समझ आवश्यक है।
आखिरकार, एक स्वस्थ समाज की स्थापना के लिए संवाद, सहिष्णुता और समझदारी की आवश्यकता होती है। क्या रघुराज सिंह का यह बयान उस दिशा में सकारात्मक बदलाव का प्रतीक है, या यह केवल एक विवादास्पद बयान है, यह समय ही बताएगा।
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