आरबीआई की नई रिपोर्ट में राज्यों के सब्सिडी खर्चों की समीक्षा की गई है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में राज्यों द्वारा सब्सिडी के बढ़ते खर्चों पर चिंता जताई है। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि राज्यों को स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, अनुसंधान और बुनियादी ढांचे में आवश्यक निवेश को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी के खर्चों की समीक्षा करने की जरूरत है। यह कदम न केवल अधिक रोजगार उत्पन्न करने में सहायक होगा, बल्कि स्थायी रूप से गरीबी को कम करने में भी मदद करेगा।
आरबीआई की रिपोर्ट का मुख्य बिंदु
रिपोर्ट में कहा गया है कि सब्सिडी खर्चों में वृद्धि कृषि ऋण माफी, मुफ्त या सब्सिडी वाली सेवाएं, जैसे बिजली, परिवहन और गैस सिलेंडर, तथा नकद हस्तांतरण जैसी योजनाओं का समावेश है। राज्यों की सरकारें इन उपायों का उपयोग चुनावों में राजनीतिक लाभ के लिए भी करती हैं। हालांकि, आरबीआई ने चेतावनी दी है कि यदि यह ट्रेंड जारी रहा तो यह राज्यों की विकासात्मक क्षमताओं को प्रभावित कर सकता है।
क्यों है यह चिंता का विषय?
आरबीआई ने सुझाव दिया है कि बढ़ते सब्सिडी खर्चों से राज्यों के वित्तीय संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है। इससे महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक बुनियादी ढांचे के निर्माण की क्षमता बाधित हो सकती है। रिपोर्ट में ये भी उल्लेख किया गया है कि उच्च ऋण-जीडीपी अनुपात, बकाया गारंटी और बढ़ते सब्सिडी बोझ राज्यों को विकास और पूंजीगत खर्च पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता को और अधिक प्रेरित करता है।
क्या हैं सुझाव?
आरबीआई ने राज्यों के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं कि उन्हें अपनी सब्सिडी खर्चों की समीक्षा करने के साथ-साथ संसाधनों को ऐसी योजनाओं में स्थानांतरित करना चाहिए जो स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और अनुसंधान में सहायक हों। इससे न केवल रोजगार के अवसर बढ़ेंगे बल्कि स्थायी तौर पर गरीबी में भी कमी आएगी।
राज्यों की स्थिति
आरबीआई ने यह भी बताया है कि कई राज्यों ने पिछले तीन वर्षों में अपने सकल राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3 प्रतिशत के भीतर रखने में सफलता प्राप्त की है। इसके साथ, राज्य सरकारों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे अपने पूंजीगत व्यय को बढ़ाएँ और व्यय की गुणवत्ता में सुधार करें।
राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून का प्रभाव
2000 के दशक की शुरुआत में राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून (एफआरएल) को अपनाने के बाद, राज्यों ने अपने प्रमुख राजकोषीय मापदंडों में सुधार किया है। इससे राज्यों का कुल ऋण भी कम हुआ है, जो मार्च 2024 के अंत तक जीडीपी का 28.5 प्रतिशत हो गया है।
आधुनिक तकनीक का उपयोग
आरबीआई की रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि डेटा एनालिटिक्स, मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करके राज्य अपनी कर प्रणाली में सुधार कर सकते हैं। इसके अलावा, समय पर शुल्क संशोधन करने से गैर-कर राजस्व को भी बढ़ाया जा सकता है।
राज्य सरकारों का प्रयास
राज्य सरकारों की कोशिश होनी चाहिए कि वे सब्सिडी खर्चों को तर्कसंगत बनाएं। उदाहरण के लिए, कई राज्य अपने किसानों को ज्यादा से ज्यादा लाभ पहुंचाने के लिए विभिन्न योजनाओं का संचालन कर रहे हैं, लेकिन उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ये योजनाएं आर्थिक दृष्टि से स्थायी हों।
शेयरिंग की आवश्यकता
आरबीआई ने यह भी कहा है कि सभी राज्यों से एक साझा दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है ताकि वे सब्सिडी योजनाओं को योजना के अनुसार अनुशासित तरीके से लागू कर सकें। यह उनके वित्तीय स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है और विकास दर को बनाए रखने में मदद करेगा।
संबंधित लिंक
-[आरबीआई के राजकोषीय समेकन पर प्रकाश डालने वाली पूरी रिपोर्ट पढ़ें।](https://www.rbi.org.in)
-[राज्यों की आर्थिक स्वास्थ्य पर विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें।](https://www.indiastat.com)
आरबीआई की यह रिपोर्ट न केवल राज्यों के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, बल्कि यह भविष्य में विकास और सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी साबित हो सकती है।

