चुनावी पारदर्शिता पर उठे सवाल, लेकिन ठोस सबूत और दीर्घकालिक कानूनी लड़ाई के बिना विपक्ष का हमला क्यों कमजोर पड़ जाता
राहुल गांधी की हालिया प्रेस कॉन्फ़्रेंस देखकर कई लोग, ख़ासकर पत्रकारों का एक वर्ग इस बात से गदगद थे कि उन्होंने “बम फोड़” दिया है। उन्होंने चुनाव आयोग पर सीधे-सीधे आरोप लगाया कि EVM के ज़रिए वोट चोरी हुई है, यह चुनाव लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ है, और आयोग ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं किया। प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उनका लहजा तीखा था, और बीच-बीच में उदाहरण देकर उन्होंने यह जताने की कोशिश भी की कि यह गड़बड़ी एक सुनियोजित साज़िश का हिस्सा है। समर्थकों को यह बयान साहसिक लगा, लेकिन मेरी नज़र में यह प्रेस कॉन्फ़्रेंस एक गहरी राजनीतिक गलती थी—क्योंकि इसमें राहुल गांधी अपनी कमज़ोरी और असहायता का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे थे, जो चुनावी राजनीति में आत्मघाती माना जाता है।
भारतीय राजनीति में, ख़ासकर चुनाव हारने के बाद, जब कोई नेता चुनाव आयोग या EVM पर आरोप लगाता है, तो तटस्थ मतदाता का बड़ा हिस्सा इसे “हार का बहाना” मान लेता है। भाजपा जैसी संसाधन-संपन्न पार्टी इस नैरेटिव को अपनी मशीनरी के ज़रिए और मजबूत करती है। मीडिया में यह लाइन चलने लगती है कि कांग्रेस मुद्दों पर लड़ने के बजाय संस्थाओं को दोष दे रही है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि EVM पर सवाल कोई नया नहीं है। 2009 से लेकर आज तक, बसपा, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, यहां तक कि भाजपा ने भी विपक्ष में रहते हुए EVM पर शंका जताई है। कानूनी मोर्चे पर भी विपक्ष ने कभी-कभार कदम उठाए हैं। उदाहरण के तौर पर, 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव के बाद बसपा सुप्रीम कोर्ट गई थी, और 2019 में 21 विपक्षी दलों जिनमें कांग्रेस भी शामिल थी, ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर VVPAT स्लिप्स की गिनती को बढ़ाने की मांग की थी। अदालत ने आंशिक रूप से उनकी बात मानी और पांच VVPAT का मिलान अनिवार्य किया, लेकिन विपक्ष की पूरी मांग (100% गिनती) को खारिज कर दिया।
इसके बाद विपक्ष इस मुद्दे पर कोई दीर्घकालिक कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सका। न तो नियमित याचिकाएं दाखिल हुईं, न तकनीकी विश्लेषण की सार्वजनिक रिपोर्टें जारी की गईं, और न ही चुनाव आयोग पर लगातार दबाव बनाने का अभियान चला। परिणाम यह हुआ कि यह मुद्दा केवल चुनावी मौसम में उठने वाली अस्थायी बहस बनकर रह गया।
राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ़्रेंस भी इसी पुराने पैटर्न में फिट हो गई न ठोस डेटा, न स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों की गवाही, न किसी कोर्ट केस का हवाला कि पार्टी इस पर संगठित तरीके से लड़ रही है। बस एक भावनात्मक घोषणा, जो सोशल मीडिया पर थोड़ी देर ट्रेंड होती है और फिर अगले मुद्दे में दब जाती है।
लेकिन यह केवल बयान की समस्या नहीं है, यह कांग्रेस के ढांचे की भी समस्या है। पार्टी के अंदर नए दिमागों, तकनीकी समझ रखने वाले विशेषज्ञों और पेशेवर चुनाव प्रबंधकों के लिए प्रवेश लगभग बंद है। जो भी सक्षम और आधुनिक सोच वाला युवा पार्टी में आता है, वह पुराने नेताओं की गुटबाज़ी, असुरक्षा और नौकरशाही जैसे व्यवहार का शिकार होकर किनारे हो जाता है। नतीजा यह है कि पार्टी का चुनावी संदेश, रणनीति और चेहरा सब पुराने, थके हुए और कई बार हास्यास्पद बयान देने वाले नेताओं के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं।
इसके विपरीत, भाजपा ने अपने संगठन में बूथ स्तर से लेकर आईटी सेल तक नए और पुराने को संतुलित किया है। वहां युवा और तकनीकी जानकार लोगों को निर्णय-प्रक्रिया में जगह मिलती है। कांग्रेस में पुराने गार्ड का वर्चस्व इस कदर है कि वे न तो नई रणनीतियों को अपनाने में लचीलापन दिखाते हैं, न तकनीकी मुद्दों पर विशेषज्ञता जुटाने में।
इसके अलावा कांग्रेस की एक और कमजोरी है जनता से जुड़े मुद्दों पर निरंतरता की कमी। विपक्ष EVM पर सवाल उठाता है, लेकिन इसे बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों की स्थिति और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़ने का ठोस प्रयास नहीं करता। मतदाता तभी इसे अपना मुद्दा मानेगा, जब उसे लगेगा कि यह उसकी रोज़मर्रा की जिंदगी और भविष्य से सीधा जुड़ा है। अभी तक विपक्ष इस नैरेटिव को बनाने में नाकाम रहा है।
राहुल गांधी का मौजूदा तरीका, चाहे नीयत में कितना भी सच्चा हो, सत्ताधारी दल के लिए राजनीतिक ईंधन बन जाता है। भाजपा इसे बार-बार उद्धृत करके यह संदेश देती है कि विपक्ष “हार मान चुका” है और अब जनता का भरोसा जीतने के बजाय संस्थाओं को दोषी ठहरा रहा है।
अगर कांग्रेस और बाकी विपक्ष वाकई इस मुद्दे पर गंभीर हैं, तो उन्हें सालभर चलने वाला संगठित अभियान छेड़ना होगा।सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में लगातार याचिकाएं, स्वतंत्र तकनीकी रिपोर्टें, चुनावी आंकड़ों का सार्वजनिक ऑडिट, और गांव-गांव जाकर मतदाताओं को जागरूक करना। यह तभी संभव है जब पार्टी के भीतर नई सोच और पेशेवर प्रबंधन को जगह दी जाए। वरना, हर बार की तरह, “बम” तो फूटेगा लेकिन वह एक दिन की सुर्खियों के बाद राख में बदल जाएगा और कांग्रेस पुराने बोझ को ढोते-ढोते और अप्रासंगिक होती जाएगी।
2017 से 2024 तक EVM पर विपक्ष की मुख्य कानूनी पहलें और उनके नतीजे
2017 – उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद
कदम: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीम कोर्ट पहुँची, यह आरोप लगाते हुए कि EVM में गड़बड़ी कर भाजपा को फ़ायदा पहुँचाया गया।
मुख्य मांग: बैलेट पेपर पर लौटना या EVM की व्यापक तकनीकी जांच।
नतीजा: सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल कोई राहत नहीं दी, बसपा को चुनाव आयोग के पास जाने को कहा। चुनाव आयोग ने EVM की विश्वसनीयता पर प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर आरोप खारिज कर दिए और दावा किया कि मशीनें हैक नहीं की जा सकतीं।
2018 – मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान चुनावों से पहले
कदम: कांग्रेस सहित कई दलों ने चुनाव आयोग को सामूहिक रूप से ज्ञापन सौंपा, मांग की कि VVPAT का मिलान सभी EVM के साथ किया जाए।
मुख्य मांग: 100% VVPAT स्लिप गिनती।
नतीजा: चुनाव आयोग ने तकनीकी और लॉजिस्टिक कारणों का हवाला देकर यह मांग ठुकरा दी।
2019 – लोकसभा चुनाव से पहले
कदम: 21 विपक्षी दल (कांग्रेस, तृणमूल, बसपा, सपा, द्रमुक, तेलुगु देशम, आदि) ने सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त याचिका दाखिल की।
मुख्य मांग: हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम 50% VVPAT स्लिप्स का EVM परिणाम से मिलान।
नतीजा: सुप्रीम कोर्ट ने आंशिक राहत दी—VVPAT मिलान को 1 मशीन से बढ़ाकर 5 मशीनों तक किया, लेकिन 50% की मांग ठुकरा दी। अदालत ने कहा कि आयोग की प्रक्रिया पर्याप्त है।
2020 – दिल्ली विधानसभा चुनाव
मुख्य मांग: आम आदमी पार्टी ने आंतरिक स्तर पर VVPAT और EVM डेटा के मिलान की स्वतंत्र जांच की मांग उठाई, लेकिन अदालत में नहीं गई।
नतीजा: कानूनी लड़ाई का अभाव, मामला केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित।
2021 – पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव
मुख्य मांग: तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर EVM के साथ बैलेट पेपर विकल्प देने की मांग की।
नतीजा: चुनाव आयोग ने इसे अस्वीकार किया, तकनीकी सुरक्षा का हवाला दिया। कोई अदालत मामला नहीं गया।
2022 – उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव
मुख्य मांग: समाजवादी पार्टी ने चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई कि कई सीटों पर EVM में गड़बड़ी हुई है और VVPAT गिनती के दौरान विसंगतियां पाई गईं।
नतीजा: चुनाव आयोग ने आरोप खारिज किए, कहा कि सभी VVPAT मिलान में परिणाम सही पाए गए। कोई ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं हुई।
2023 – विपक्षी दलों की संयुक्त बैठक
मुख्य मांग: INDIA गठबंधन की बैठकों में EVM मुद्दे को एकजुट होकर उठाने पर चर्चा हुई।
नतीजा: कोई औपचारिक कानूनी पहल नहीं की गई, मामला केवल मीडिया बयान तक सीमित रहा।
2024 – लोकसभा चुनाव
मुख्य मांग: मतदान के बाद कांग्रेस, तृणमूल और कुछ अन्य दलों ने अनौपचारिक रूप से चुनाव आयोग से डेटा की पारदर्शिता की मांग की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में कोई नई याचिका नहीं दायर की गई।
नतीजा: चुनाव आयोग ने कहा कि प्रक्रिया सुरक्षित है और सभी उम्मीदवारों को EVM डेटा का निरीक्षण करने का अवसर दिया जाता है।
2017 से 2024 के बीच विपक्ष ने EVM पर सवाल तो बार-बार उठाए, लेकिन कानूनी लड़ाई केवल 2017 और 2019 में संगठित रूप से सुप्रीम कोर्ट तक पहुँची। 2019 के बाद कोई भी दीर्घकालिक, चरणबद्ध या तकनीकी रूप से मज़बूत कानूनी अभियान नहीं चला। परिणामस्वरूप, यह मुद्दा जनता की नज़र में “चुनावी हार का बहाना” बन गया, और सत्ता पक्ष के नैरेटिव को मजबूत करने का साधन भी।

