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Wednesday, January 21, 2026

लालू यादव के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में राष्ट्रपति ने दी मंजूरी, बढ़ेंगी मुश्किलें

इंडियालालू यादव के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में राष्ट्रपति ने दी मंजूरी, बढ़ेंगी मुश्किलें

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव पर मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में राष्ट्रपति की मंजूरी

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जमीन के बदले नौकरी घोटाले के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, द्रौपदी मुर्मू ने सीआरपीसी की धारा 197(1) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 218 के तहत यह अनुमति प्रदान की है। यह मामला देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है, और इसके राजनीतिक और कानूनी निहितार्थों पर गहन चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं।

किसके खिलाफ है यह मामला?

यह केस मुख्यतः लालू प्रसाद यादव, उनके बेटे तेजस्वी यादव, और उनके परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ है। यह मामला उनके द्वारा रेलवे में नौकरियों के लिए जमीन लेने के तरीके पर आधारित है, जिसमें आरोप है कि उन्होंने घोटाले के तहत मनी लॉन्ड्रिंग की। जब लालू यादव रेलवे मंत्री थे, तब कई लोगों को रेलवे में नौकरी देने के बदले में उनसे जमीनें ली गईं। ईडी ने पिछले साल अगस्त में इस मामले में आरोप पत्र दायर किया था।

कहां और कब शुरू हुआ मामला?

जमीन के बदले नौकरी घोटाला तब शुरू हुआ जब लालू यादव, जो कि यूपीए की पहली सरकार में रेल मंत्री थे, ने रेलवे के ग्रुप डी में भर्तियां की। कई आरोप हैं कि यह भर्तियां बिना किसी विज्ञापन के की गईं, और अभ्यर्थियों से सीधे जमीन के बदले में घूस ली गई। ईडी ने कहा कि लालू परिवार को सात विभिन्न स्थानों पर जमीनें मिलीं। इस मामले में सीबीआई द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग केस दर्ज किया गया था।

क्या है जांच की प्रक्रिया?

ईडी ने इस मामले की जांच की प्रक्रिया में कई धाराओं के तहत कार्रवाई की है। इसके तहत लालू यादव और उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई है। ईडी ने आरोप लगाया है कि लालू यादव ने अपने परिवार के सदस्यों और सहयोगियों के साथ मिलकर आपराधिक साजिश रची। इसमें यह आरोप भी शामिल है कि उन्होंने धार्मिक रूप से संपत्तियों को छिपाने के लिए अपने सहयोगियों की मदद ली।

क्या है घोटाले की असल कहानी?

लालू यादव के इस घोटाले में गहराई से जाने पर पता चलता है कि यह एक सुनियोजित अपराध था, जिसमें कई लोगों को नौकरी देने के नाम पर बेवजह जमीन देने के लिए मजबूर किया गया। यह न केवल कानूनी कार्रवाई का विषय है, बल्कि जनता के विश्वास का भी मामला है। जब रोजगार की इतनी कठिनाइयाँ हैं, ऐसे में इस तरह की धोखाधड़ी एक गंभीर आरोप है।

पारिवारिक जुड़ाव और आरोप

इस मामले में लालू परिवार के अन्य सदस्यों की भी भूमिका है। उनकी पत्नी राबड़ी देवी, सांसद बेटी मीसा भारती और अन्य परिजन भी इसमें शामिल हैं। ईडी ने इन सभी के खिलाफ पहले से ही चार्जशीट दायर कर दी है। यह मामला इतना गंभीर है कि दिल्ली की विशेष पीएमएलए अदालत ने भी इस पर संज्ञान लिया है और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह मामला अब और गंभीरता से लिया जाएगा।

क्या कहती हैं संबंधित संस्थाएं?

इस मामले में ईडी और सीबीआई दोनों ने मिलकर कार्यवाही की है। दोनों संस्थाएं लगातार इस घोटाले की गहराई में जाने का प्रयास कर रही हैं। ईडी का कहना है कि यह केवल एक जमीन का मामला नहीं है, बल्कि इस प्रकार के घोटाले भारतीय राजनीति और प्रशासन की छवि को धूमिल करते हैं।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ

लालू प्रसाद यादव के खिलाफ बढ़ते कार्रवाई के बीच कई राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी आ चुकी हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि यह सब विपक्षी दलों द्वारा की गई राजनीति है। जबकि विपक्ष इस पर अपने रुख को मजबूत कर रहा है। इसके अलावा, यह मामला बिहार की राजनीति में भी एक महत्वपूर्ण मोड़ ला सकता है।

प्रभावी जांच की आवश्यकता

इस मामले में निष्पक्ष और प्रभावी जांच की आवश्यकता है। इससे यह साफ होता है कि किस प्रकार से उच्च पदों पर बैठे लोग कैसे गलत तरीके से अपनी शक्ति का प्रयोग करते हैं। इसके माध्यम से यह भी समझना महत्वपूर्ण है कि कैसे सही प्रक्रियाओं का पालन न करने से समाज में भ्रष्‍टाचार बढ़ता है।

आगे की कार्रवाई

इस मामले की सुनवाई जल्द ही शुरू हो सकती है और इसके परिणाम वर्ष 2024 के आम चुनावों पर भी असर डाल सकते हैं। ईडी द्वारा की गई कार्रवाई और राष्ट्रपति की मंजूरी ने इसे एक नया मोड़ दिया है। अब राजनीतिक गलियारों में स्थिति और भी रोमांचक हो गई है।

संबंधित स्रोतों से जानकारी के लिए यहाँ देखें:[https://www.reuters.com]और[https://www.bbc.com]इस प्रकार के मामलों में जनता की जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है, ताकि आगामी समय में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति न हो सके। यह केवल राजनीतिज्ञों के लिए एक झटका नहीं है, बल्कि समस्त समाज के लिए एक चेतावनी भी है।

 

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