भारत की प्रेस स्वतंत्रता में गिरावट का चेहरा: क्या हम सच में लोकतंत्र की राह से भटक रहे हैं?
हर साल 3 मई को दुनियाभर में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। इस दिन रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स की ओर से विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक जारी किया जाता है। 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत 180 देशों में 151वें स्थान पर है। इस सूचकांक में भारत का स्थान पिछले वर्षों में लगातार गिरता जा रहा है, जो पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
इस रिपोर्ट में यह भी उजागर होता है कि भारत अपने पड़ोसी देशों जैसे नेपाल (90वां), मालदीव (104वां), श्रीलंका (139वां), और बांग्लादेश (149वां) से भी नीचे है। हालांकि, भारत की स्थिति भूटान (152वां), पाकिस्तान (158वां), म्यांमार (169वां), अफगानिस्तान (175वां), और चीन (178वां) की तुलना में थोड़ी बेहतर है। लेकिन यह गिरावट चिंता का विषय है, जो यह इंगित करती है कि भारतीय पत्रकारिता को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य: राजनीतिक और आर्थिक दबाव
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय मीडिया पर राजनीतिक दबाव, आर्थिक निर्भरता और संपादकीय स्वतंत्रता की कमी साफ दिखाई दे रही है। कई टीवी चैनल और डिजिटल पोर्टल्स ने अपनी संपादकीय स्वतंत्रता को त्यागकर एकतरफा नैरेटिव को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है। यही वजह है कि “नीतिपरक मीडिया” जैसे शब्द आम हो गए हैं, जो उनके रिपोर्टिंग के तरीकों की एक सभ्य आलोचना है।
एक हालिया उदाहरण के तौर पर, पहलगाम हमले के मामले में मीडिया का व्यवहार देखने को मिला है, जहां कुछ मीडिया चैनल सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के प्रवक्ता की तरह काम कर रहे हैं, बजाय इसके कि वे जनता को निष्पक्ष जानकारी प्रदान करें। यह स्थिति इतनी बिगड़ गई कि सरकार को खुद एक एडवाइजरी जारी करनी पड़ी कि मीडिया अपनी सीमा में रहे।
संविधान और सामाजिक मुद्दों का निराधार वाद-विवाद
कुछ टीवी एंकरों ने ऐसी बहसों को बढ़ावा दिया है जिनमें जनहित के मुद्दों के बजाय विभाजनकारी, उत्तेजक और तनाव पैदा करने वाले विषयों को तरजीह दी जाती है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत ढांचे जैसे मुद्दों को पीछे छोड़कर धार्मिक विवाद, सीमाई तनाव या अल्पसंख्यकों के खिलाफ भावनात्मक उकसावे को प्राथमिकता दी जाती है। यह रवैया न केवल पत्रकारिता की साख को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि सामाजिक सौहार्द के लिए भी खतरा है।
वैश्विक संस्थाओं की चेतावनी: पत्रकारिता का संकुचन
रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स के अनुसार, “भारत में मीडिया की बहुलता खतरे में है, क्योंकि मीडिया का स्वामित्व कुछ ताकतवर राजनीतिक और कॉरपोरेट घरानों तक सिमट गया है।” यह सूचकांक पांच मानदंडों पर देशों का मूल्यांकन करता है: राजनीतिक, कानूनी, सामाजिक, आर्थिक और सुरक्षा से संबंधित। रिपोर्ट की संपादकीय निदेशक एन बेकेंडे ने कहा, “आर्थिक स्वतंत्रता के बिना स्वतंत्र मीडिया संभव नहीं है।” जब संस्थाएं वित्तीय संकट में होती हैं, तो वे गंभीर पत्रकारिता के बजाय सनसनीखेज रिपोर्टिंग की ओर झुक जाती हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से भारतीय मीडिया एक “अघोषित आपातकाल” जैसी स्थिति में है। सरकार से निकटता रखने वाले बड़े मीडिया समूहों ने स्वतंत्र मीडिया को और कमजोर किया है, जिससे पत्रकारिता की असली पहचान खतरे में पड़ गई है।
पत्रकारिता की असली जिम्मेदारी: जनहित की रक्षा
मीडिया का काम सरकार का प्रवक्ता बनना नहीं, बल्कि जनसमस्याओं को उजागर करना, सवाल पूछना और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देना है। जब पत्रकारिता अपने असल मिशन से भटककर सिर्फ शक्तिशाली लोगों की आवाज बन जाती है, तो उसकी साख, प्रभाव और विश्वास को नुकसान पहुंचना तय है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रैंकिंग गिरना कोई आश्चर्य की बात नहीं।
हालांकि, अब भी कुछ पत्रकार और संस्थान ऐसे हैं जो ईमानदारी, संतुलन और शोध पर आधारित रिपोर्टिंग के सिद्धांतों को निभा रहे हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि ऐसे लोगों और संस्थाओं को समर्थन और प्रोत्साहन मिले।
आगे का रास्ता: सुधार की दिशा में कदम
आज की स्थिति यह संकेत करती है कि भारतीय मीडिया को अपनी दिशा में सुधार लाने की आवश्यकता है। स्वतंत्रता और जिम्मेदारी के साथ-साथ, पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। यह समय है कि पत्रकारिता खुद को पुनः स्थापित करे और अपने वास्तविक उद्देश्य की ओर बढ़े।
अधिक जानकारी के लिए पढ़ें:[रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स](https://rsf.org/) और[सामाजिक सौहार्द और पत्रकारिता](https://www.journalism.org/)।
(लेखक ‘इनक़लाब’, दिल्ली के रेज़िडेंट एडिटर हैं)
yameen@inquilab.com
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