महाकुंभ में हर्षा रिछारिया की वायरल तस्वीरें और साध्वी पहचान पर उठे सवाल
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला: हाल ही में प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ मेले के दौरान एक युवती, हर्षा रिछारिया, अपनी तस्वीरों के कारण चर्चा का विषय बनी हुई हैं। उनकी तस्वीरें वायरल हो गईं और उन्हें ‘साध्वी’ के रूप में प्रस्तुत किया गया। लेकिन, इस मामले में जब सोशल मीडिया पर उनकी असली पहचान उजागर हुई तो हर्षा ने इस पर अपनी सफाई पेश की।
कौन हैं हर्षा रिछारिया?
हर्षा रिछारिया एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हैं, जिन्होंने हाल ही में महाकुंभ में भाग लिया। उनकी तस्वीरों में उन्होंने साध्वी का लिबास धारण किया हुआ था, जिसमें पीत वस्त्र, रुद्राक्ष माला और माथे पर तिलक शामिल थे। जब लोगों ने उन्हें ‘सुंदर साध्वी’ के रूप में बुलाना शुरू किया, तो वे वायरल हो गईं। परंतु, जैसे ही उनकी असली पहचान सामने आई, उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी साध्वी होने का दावा नहीं किया है।
क्या हुआ?
हर्षा ने एबीपी न्यूज से बातचीत में कहा कि उन्होंने कभी भी खुद को साध्वी की तरह नहीं बताया। उनका कहना था, “मैंने कहीं नहीं कहा कि मैं साध्वी हूं। मैं केवल मंत्र दीक्षा ली है और अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक यात्रा की ओर बढ़ रही हूं।” उन्होंने अपनी पहचान के बारे में चर्चा करते हुए यह भी बताया कि लोगों ने उन्हें ‘साध्वी’ का टैग दिया, जो कि उनके लिए उचित नहीं था।
कहाँ और कब हुआ यह सब?
यह सब कुछ प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ के आयोजन के समय हुआ, जब हर्षा ने वहां पहुंचकर अपनी तस्वीरें साझा कीं। महाकुंभ का यह धार्मिक आयोजन हर 144 वर्षों में एक बार होता है और इसका महत्व हिन्दू धर्म में बहुत अधिक है। हर्षा ने इस महाकुंभ में पहले शाही स्नान का अनुभव भी साझा किया, जिसमें उन्होंने खुद को बहुत सौभाग्यशाली समझा।
क्यों यह मामला चर्चा में है?
हर्षा का यह बयान और उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में आईं। जब उनकी साध्वी होने की पहचान का सच सामने आया, तो लोगों में एक नई बहस शुरू हो गई। उन्होंने यह बताया कि साध्वी होना एक गंभीर और महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसमें कई प्रकार की परंपराएं और संस्कार शामिल होते हैं। लेकिन वे खुद को साध्वी नहीं मानतीं।
कैसे हुआ यह विवाद?
हर्षा ने कहा, “मैं साध्वी नहीं हूं। मैं इस ओर बढ़ रही हूं। मुझे सोशल मीडिया और लोगों ने साध्वी का टैग दे दिया। यह टैग ठीक नहीं हैं।” उनके अनुसार, साध्वी होने के लिए कई परंपराओं का पालन करना आवश्यक है, जो उन्होंने नहीं किया है। यह स्पष्ट करने के लिए, हर्षा ने कहा कि वह केवल मंत्र दीक्षा की प्रक्रिया में हैं, जिसे कोई भी गृहस्थ जीवन में भी ले सकता है।
हर्षा रिछारिया की सोशल मीडिया पर उपस्थिति काफी प्रभावशाली है और उनके फॉलोअर्स की संख्या एक मिलियन से अधिक है। वे निरंजनी अखाड़ा से जुड़ी हुई हैं और आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी श्री कैलाशानंदगिरी की शिष्या हैं।
क्यों लिया अध्यात्म का मार्ग?
हर्षा ने कहा कि उन्होंने जीवन में सुकून की तलाश में अध्यात्म का मार्ग चुना है। महाकुंभ में भाग लेकर उन्होंने जो अनुभव प्राप्त किया, वह उनके लिए महत्वपूर्ण था। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा, “मैं खुद को सौभाग्यशाली समझती हूं कि मैं इस पूर्ण महाकुंभ का हिस्सा बन पाई।”
हर किसी को हर्षा के इस सफाई बयान का इंतजार था, खासकर उन लोगों को जो उन्हें साध्वी मान बैठे थे। उनकी पहचान के बारे में जो भ्रम था, वह अब दूर हो चुका है। अलग-अलग मतों के बीच, हर्षा ने अपनी स्थिति को स्पष्ट किया है।
क्या कहते हैं लोग?
सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर कई प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। कुछ लोग उन्हें साध्वी के रूप में स्वीकार करते हैं, जबकि कुछ ने उनके विचारों का समर्थन किया है। यह स्पष्ट है कि हर्षा ने अपने विचार और अपनी पहचान को प्रस्तुत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
इस मुद्दे ने यह भी सवाल उठाया है कि समाज में ‘साध्वी’ का टैग किसी व्यक्ति पर थोपना कितना उचित है। इस पर चर्चा अभी भी जारी है। हालांकि, हर्षा ने इस मुद्दे पर खुलकर जवाब दिया है और अपनी असली पहचान को सामने लाया है।
हर्षा रिछारिया का यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि केवल दिखावे से ही किसी व्यक्ति की पहचान नहीं बनती, बल्कि उनके आचार-विचार और कार्य प्रणाली भी महत्वपूर्ण हैं।
इससे साफ़ है कि हर्षा रिछारिया की कहानी सिर्फ एक साध्वी के रूप में उनकी पहचान के बारे में नहीं है, बल्कि यह आधुनिक युवा पीढ़ी की संघर्षों और पहचान के बारे में भी चर्चा का विषय है।

