सुप्रीम कोर्ट ने लखीमपुर खीरी हिंसा के गवाहों को धमकाने के मामलों पर दिखाई सख्ती
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने लखीमपुर खीरी में 2021 में हुई हिंसा के संबंध में गवाहों को धमकाने के आरोपों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। मुख्य आरोपी आशीष मिश्रा उर्फ टेनी, जो कि पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा के बेटे हैं, पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश की। न्यायालय ने इस मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस से रिपोर्ट मांगी है और लखीमपुर खीरी के एसपी को इस मामले की जांच करने का निर्देश दिया है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ मौजूद थी। पीठ ने कहा कि गवाहों को धमकाने के आरोपों पर सख्त नाराजगी जताई गई। आशीष मिश्रा के वकील सिद्धार्थ दवे ने इन आरोपों से इन्कार किया और दावा किया कि हर बार जब मामला अदालत में आता है, तो उन पर इस तरह के आरोप लगाए जाते हैं, जिससे यह प्रतीत होता है कि उनका मुवक्किल एक जानबूझकर निशाना है।
मामले का पृष्ठभूमि
लखीमपुर खीरी में 3 अक्टूबर 2021 को किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा में आठ लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना में चार किसानों की मौत एक कार के द्वारा कुचलकर हुई थी। इन किसानों का विरोध उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के दौरे के खिलाफ था। इसके बाद गुस्साए किसानों ने कार के चालक और दो भाजपा कार्यकर्ताओं की पीट-पीटकर हत्या कर दी। इस मामले में आशीष मिश्रा मुख्य आरोपी माने जाते हैं।
आरोपों के समर्थन में सबूत
शिकायतकर्ताओं के वकील प्रशांत भूषण ने अदालत में दावा किया कि उनके पास गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश के कई महत्वपूर्ण सबूत हैं, जिसमें ऑडियो रिकॉर्डिंग भी शामिल है। उन्होंने कहा कि आशीष मिश्रा ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन करते हुए एक सार्वजनिक सभा में भाग लिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने गवाहों को दबाव में लाने का प्रयास किया। भूषण ने अदालत से आशीष मिश्रा की जमानत रद्द करने की मांग की, ताकि न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने भूषण और दवे को निर्देश दिया कि वे अपनी सामग्री को उत्तर प्रदेश सरकार की स्थायी वकील रुचिरा गोयल को सौंपें, ताकि इसे लखीमपुर खीरी के एसपी को सौंपा जा सके। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी, जिससे यह स्पष्ट होगा कि गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है या नहीं।
आशीष मिश्रा की जमानत की स्थिति
सुप्रीम कोर्ट ने आशीष मिश्रा को पहले 22 जुलाई को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया था, लेकिन यह शर्त भी रखी थी कि उन्हें दिल्ली और लखनऊ के बाहर न रहने का निर्देश दिया गया था। इसके पीछे तर्क था कि इससे वह गवाहों को प्रभावित नहीं कर सकेंगे। हालांकि, बाद में 26 सितंबर को उन्हें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहने की अनुमति दी गई थी, जिससे उनके और गवाहों के बीच का तलाक कुछ हद तक कम हो गया था।
आगे की कार्रवाई
लखीमपुर खीरी हिंसा जैसे जटिल मामलों में गवाहों की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि वे गवाहों के खिलाफ किसी भी प्रकार का दबाव बर्दाश्त नहीं करेंगे और यदि ऐसा पाया गया, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।
इस मामले में आने वाले समय में क्या निर्णय होता है, यह महत्वपूर्ण होगा। न्यायपालिका की इस सक्रियता से यह प्रतीत होता है कि न्याय का पहिया सुचारु रूप से चलेगा और गवाहों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी।
इस प्रकार, यह पूरा मामला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में भी गहरे प्रभाव डाल सकता है। इस मामले में आम जनता की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट की निरंतर सुनवाई पर टिकी रहेंगी।

