Sunday, March 22, 2026

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एल्गार परिषद-माओवादी लिंक मामले में रोना विल्सन और सुधीर धवले को दी जमानत

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने दी जमानत

बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को एल्गार परिषद-माओवादी लिंक मामले में लंबी अवधि से जेल में बंद रोना विल्सन और सुधीर धवले को जमानत दी है। ये दोनों 2018 से इस मामले में जेल में थे। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने दोनों के लंबे समय से जेल में रहने और मामले के जल्द निपटारे की संभावना कम होने के कारण जमानत प्रदान की है।

किसने, क्या, कहाँ, कब और क्यों

कानून में कई जटिलताएँ होती हैं, लेकिन इस विशेष मामले में, रोना विल्सन और सुधीर धवले को 2018 में गिरफ्तार किया गया था। यह मामला उस समय शुरू हुआ जब पुणे में 31 दिसंबर, 2017 को आयोजित एल्गार परिषद सम्मेलन के दौरान भड़काऊ भाषण दिए गए थे, जिसके कारण पुणे जिले के कोरेगांव-भीमा में हिंसा भड़क गई थी। इस मामले में पहले पुणे पुलिस ने यह भी दावा किया था कि सम्मेलन को माओवादियों का समर्थन प्राप्त था। बाद में केस की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अपने हाथ में ले ली।

जमानत का आदेश

बुधवार को हाईकोर्ट में जस्टिस ए एस गडकरी और कमल खता की खंडपीठ ने यह आदेश दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि वह इस समय मामले के गुण-दोष पर विचार नहीं कर रहा है। अदालत ने यह भी कहा कि मामले में 300 से ज़्यादा गवाह हैं, जिससे निकट भविष्य में मुकदमे का निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।

अभियुक्तों का बचाव

बचाव पक्ष के वकीलों मिहिर देसाई और सुदीप पासबोला ने जोर देकर कहा कि दोनों आरोपी 2018 से जेल में हैं और अभी तक विशेष अदालत में आरोप तय नहीं हुए हैं। यह सुनते ही अदालत ने उनके जमानत की अनुमति दी। कोर्ट ने निर्दिष्ट किया कि दोनों को एक-एक लाख रुपये का मुचलका जमा करने और मुकदमे की सुनवाई के लिए विशेष NIA अदालत के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले से जुड़े अभियुक्तों में से कई पहले ही जमानत पर बाहर आ चुके हैं। रोना विल्सन को जून 2018 में दिल्ली में उनके घर से गिरफ्तार किया गया था, जबकि सुधीर धवले को पहले गिरफ्तार किया गया था और उन पर प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सक्रिय सदस्य होने का आरोप था।

विसंगति और साक्ष्य

इस मामले की जांच में सामने आए सबूतों के आधार पर, कई संगठनों ने इस आरोप को गलत बताया है। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि मौखिक सबूतों और साक्ष्यों की कमी इस मामले को जटिल बना रही है। इस जमानत से यह साफ होता है कि न्यायालय ने यह मान लिया है कि आरोपियों को निष्पक्ष सुनवाई का हक है और उन्हें बिना किसी सबूत के लंबे समय तक जेल में नहीं रहना चाहिए।

विशेष अदालत का दृष्टिकोण

विशेष अदालत की ओर से कोई भी सुनवाई अब तक नहीं हुई है, जिससे यह साबित होता है कि मामला लंबा खिचता जा रहा है। इस बात को ध्यान में रखते हुए, हाईकोर्ट ने यह फैसला लिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वे मामले की गंभीरता को नहीं देख रहे हैं, बल्कि उन्हें यह महत्वपूर्ण लगा कि आरोपियों को लंबे समय तक बिना सुनवाई के नहीं रखा जा सकता।

आगे का रास्ता

जमानत मिलने के बाद, अब रोना विल्सन और सुधीर धवले को निश्चित अंतराल पर विशेष अदालत के सामने पेश होना होगा। इसके अलावा, उन्हें सुनवाई के समय सभी न्यायिक आदेशों का पालन करना होगा। यह भी जरूरी है कि यदि कोई नया मामला सामने आता है, तो उन्हें अपने बचाव में उचित दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे।

अंतिम विचार

यह जमानत एक महत्वपूर्ण कदम है जो न केवल इन आरोपियों के लिए बल्कि न्यायालय प्रणाली के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह एक संकेत है कि न्याय में देरी न केवल अभियुक्तों के लिए बल्कि समाज के लिए भी हानिकारक हो सकती है।

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें:
-[अमर उजाला](https://www.amarujala.com)
-[BBC हिंदी](https://www.bbc.com/hindi)

इस प्रकार, बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा दी गई इस जमानत ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि न्यायालय के समक्ष सभी को बराबरी का अधिकार है और किसी को भी बिना उचित सुनवाई के न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।

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