तहव्वुर राणा ने की सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, भारत प्रत्यर्पण से बचने के लिए जमकर की कोशिश
तहव्वुर राणा, जो मुंबई के 2008 के आतंकवादी हमलों के साजिशकर्ता माने जाते हैं, ने भारत के साथ अपने प्रत्यर्पण को रोकने के लिए अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की है। राणा का यह प्रयास उनकी कानूनी लड़ाई में एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है, क्योंकि वे पहले ही अपील न्यायालय और अन्य कई संघीय अदालतों में कड़ी मेहनत कर चुके हैं, लेकिन सफलता नहीं मिली है। इस याचिका में राणा के वकील ने “दोहरे खतरे के सिद्धांत” का हवाला देते हुए यह तर्क दिया है कि उन्हें पहले ही संबंधित आरोपों में बरी किया जा चुका है।
कौन, क्या, कहां, कब और क्यों: राणा का कानूनी संघर्ष
तहव्वुर राणा, जो पाकिस्तानी मूल के कनाडाई नागरिक हैं, ने अपनी याचिका में कहा है कि उन्हें इलिनोइस की संघीय अदालत द्वारा पहले ही 2008 में मुंबई हमले से संबंधित आरोपों से बरी किया गया था। अब भारतीय अधिकारियों ने उन पर फिर से आरोप लगाने का कार्य किया है, जिसके लिए उन्हें पहले ही बरी किया जा चुका है। उनकी यह याचिका इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह पता चलता है कि अमेरिका की अदालतें भारत के द्वारा लगाए गए नए आरोपों को कैसे देखती हैं।
राणा की यह नई याचिका 17 जनवरी को सुनवाई के लिए पेश की जाएगी। वर्तमान में राणा लॉस एंजेलिस की जेल में बंद हैं। जब हमला हुआ था, तब कुल 166 लोग उनकी वजह से मारे गए थे, जिनमें छह अमेरिकी नागरिक भी शामिल थे।
कैसे शुरू हुआ कानूनी संघर्ष
तहव्वुर राणा का कानूनी संघर्ष अमेरिका के संघीय न्यायालयों में शुरू हुआ, जहां उन्होंने मुंबई में हुए आतंकवादी हमले में अपनी संलिप्तता से इंकार किया था। उन्हें 2008 में शिकागो की अदालत ने बरी कर दिया था, लेकिन भारत ने उन्हें फिर से प्रत्यर्पित करने की मांग की है। अमेरिकी न्याय प्रणाली में “दोहरे खतरे के सिद्धांत” का उपयोग करते हुए, राणा ने यह तर्क दिया कि उनके खिलाफ दो बार एक ही अपराध के लिए मुकदमा चलाया जा रहा है।
बता दें कि अमेरिकी सरकार भी राणा के प्रत्यर्पण के लिए तैयार है। इससे पहले 16 दिसंबर को, अमेरिकी सॉलिसिटर जनरल एलिजाबेथ बी प्रीलोगर ने सुप्रीम कोर्ट से राणा की याचिका खारिज करने की अपील की थी। राणा के वकील ने अमेरिकी सरकार की इस सिफारिश को चुनौती दी और अदालत से अनुरोध किया कि उनकी याचिका स्वीकार की जाए।
अमेरिका और भारत के बीच कानूनी जंग
राणा के मामले में अमेरिका और भारत के बीच कानूनी जंग चल रही है। भारतीय अधिकारियों ने राणा के प्रत्यर्पण के लिए कई बार अनुरोध किया है, लेकिन अमेरिकी न्यायालयों में उनकी स्थिति को लेकर काफी विवाद चल रहा है। राणा का दावा, अगर सफल हो गया, तो इससे यह संदेश जाएगा कि कानूनी प्रक्रियाएं कितनी जटिल हो सकती हैं, खासकर जब यह अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों से जुड़ी होती हैं।
सुप्रीम कोर्ट में राणा की याचिका पर सुनवाई के बाद यह जानना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका की न्याय व्यवस्था उन्हें भारत को प्रत्यर्पित करने की अनुमति देगी या नहीं।
तहव्वुर राणा के मामले की महत्ता
इस मामले की महत्ता केवल कानूनी दायरे में नहीं, बल्कि राजनीतिक क्षितिज पर भी है। राणा का भारतीय अधिकारियों के खिलाफ खड़ा होना, आतंकवाद के मामलों में न्याय के प्रति अमेरिका का दृष्टिकोण भी दर्शाता है। अगर राणा को प्रत्यर्पित किया जाता है, तो यह भारत के लिए एक बड़ी जीत होगी, जबकि अगर वह बच निकलते हैं, तो यह अमेरिका की न्याय प्रणाली पर कई सवाल खड़े कर सकता है।
राणा की याचिका पर आने वाले समय में क्या होगा?
जैसे-जैसे राणा की याचिका पर सुनवाई का दिन नजदीक आता है, कानूनी विशेषज्ञ इसे एक महत्वपूर्ण मोड़ मान रहे हैं। यह भविष्य निर्धारित करेगा कि क्या भारत को राणा के खिलाफ अपनी कानूनी लड़ाई में सफलता मिलेगी या फिर वे अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करते हुए अमेरिका में ही रहेंगे।
विद्यालय से लेकर जयशंकर तक, सभी इस मामले को ध्यानपूर्वक देख रहे हैं। भारत में भी इस मामले की गूंज सुनाई दे रही है, और भारतीय मीडिया इस पर अपनी नजरें बनाए हुए हैं।
अतिरिक्त जानकारी के लिए, आप[BBC](https://www.bbc.com/hindi) और[The Times of India](https://timesofindia.indiatimes.com) पर भी जा सकते हैं।

