जयपुर: राजस्थान के कोतपूतली में बोरवेल में फंसी तीन साल की बच्ची चेतना को बचाने के लिए किया गया बचाव अभियान 10 दिन चला, लेकिन अंततः बच्ची की जान नहीं बचाई जा सकी। 23 दिसंबर को खेलते समय चेतना बोरवेल में गिर गई थी और उसे 150 फीट की गहराई पर फंसा पाया गया। प्रशासन और बचाव दल ने कई उपाय किए लेकिन समय पर वांछित परिणाम नहीं हासिल कर सके। बच्ची की मौत ने पूरे गांव में ग़म का माहौल बना दिया है।
कौन, क्या, कब, कहां और क्यों: ऑपरेशन का पूरा विवरण
क्या हुआ? – 23 दिसंबर को, कोतपूतली के किरतपुरा क्षेत्र में खेलते समय तीन वर्षीय चेतना बोरवेल में गिर गई। उसके बाद से ही परिवार और स्थानीय लोग उसे निकालने के लिए सुनिश्चित प्रयासों में जुट गए। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमों ने मौके पर पहुंचकर बचाव अभियान शुरू किया।
कहां? – यह घटना राजस्थान के कोतपूतली में हुई, जहां बच्ची बोरवेल में गिरी थी।
कब? – बच्ची 23 दिसंबर को बोरवेल में गिरी और उसका शव 1 जनवरी को बाहर निकाला गया।
क्यों? – बच्चों के लिए बोरवेल एक बड़ा खतरा होता है और चेतना की इस हादसे में गिरने का मुख्य कारण लापरवाही और बोरवेल की अपर्याप्त सुरक्षा मानकों को बताया जा रहा है।
कैसे? – एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीम ने सबसे पहले बच्ची को ऑक्सीजन पहुँचाने का प्रयास किया। इसके बाद देसी जुगाड़ के माध्यम से पहले प्रयास किए गए, लेकिन जब वे असफल रहे, तो प्रशासन ने बोरवेल के समानांतर एक गड्ढा खोदने का निश्चय किया।
रेस्क्यू ऑपरेशन का क्रम
– **23 दिसंबर:** बच्ची दोपहर 1:50 बजे बोरवेल में गिरी। जानकारी मिलने के बाद प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची और रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया।
– **24 दिसंबर:** प्रशासन ने बच्ची को बाहर निकालने के लिए पाइलिंग मशीन मंगवाई।
– **25 दिसंबर:** पाइलिंग मशीन से गड्ढा खोदने का कार्य शुरू किया गया।
– **26 दिसंबर:** गड्ढे की गहराई को चेक किया गया और सेफ्टी पाइप तय किये गए।
– **27-30 दिसंबर:** ठोस प्रयासों के बावजूद तकनीकी समस्याओं के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन में देरी होती रही।
– **31 दिसंबर:** एनडीआरएफ के जवानों ने 10 फीट गहरी सुरंग की खोदाई की, लेकिन यह गलत दिशा में चली गई।
– **1 जनवरी 2025:** अंततः, 10 दिन बाद, बच्ची को बाहर निकाला गया, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी; उसकी मौत हो चुकी थी।
गांव में छाया मातम
इस हादसे ने न केवल बच्ची के परिवार को बल्कि पूरे गांव को गहरे सदमे में डाल दिया है। मातम और कैलाश की घड़ी के बीच, गांव के लोग और प्रशासन इस स्थिति की निंदा कर रहे हैं।
परिवार की आपत्ति और प्रशासन की सेवाएं
परिवार ने बचाव अभियान में प्रशासन की लापरवाही पर सवाल उठाए हैं। बच्ची की माता ने कहा कि समय पर उपयुक्त कदम उठाए गए होते, तो शायद उनकी बच्ची को बचाया जा सकता था। प्रशासन द्वारा किए गए प्रयासों की निरंतरता पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरण
भारत में यह पहली बार नहीं हुआ है जब बोरवेल में कोई बच्चा गिरा हो। इससे पहले भी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जहां बोरवेल के उचित सुरक्षा उपायों की कमी के कारण बच्चे जीवन से हाथ धो बैठते हैं।
समाप्ति
बच्ची चेतना का हादसा, जिसे बचाने की कोशिश दस दिनों तक चली, ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर हमें और गंभीर होने की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बोरवेल की उचित सुरक्षा और उसके आसपास जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में ऐसे दुखद हादसे न हों।
इस संबंध में और जानने के लिए यहाँ देखें[NDRF की पहल](https://ndrf.gov.in) और[बच्चों की सुरक्षा पर विशेष रिपोर्ट](https://www.unicef.org).
राजस्थान में इस प्रकार की घटनाओं की रोकथाम के लिए शिक्षा और जागरूकता बढ़ाना बेहद महत्वपूर्ण है। इस हादसे ने हमें एक छवि दी है कि कैसे लापरवाही एक मासूम की जान ले सकती है।

