बिहार में बॉबी हत्याकांड: सच्चाई की खोज में जुटे किशोर कुणाल
बिहार राज्य में एक ऐसा कांड हुआ जिसने न केवल पुलिस प्रशासन को हिलाकर रख दिया, बल्कि इसे राजनीतिक गलियारे तक पहुंचा दिया। आईपीएस किशोर कुणाल, जिन्होंने इस मामले की जांच की, ने अपनी किताब में बताया है कि कैसे उन्होंने एक शव को कब्र से निकालकर उसके पीछे की सच्चाई का पता लगाने का प्रयास किया। यह घटना तब हुई थी जब 1983 में एक युवा महिला, श्रेतनिशा त्रिवेदी, जिसे ‘बॉबी’ के नाम से जाना जाता था, की हत्या के मामले में कोई ठोस सबूत नहीं था। इस लेख में हम जानेंगे कि किस प्रकार किशोर कुणाल ने इस मामले को सुलझाने की प्रक्रिया को अंजाम दिया।
कौन, क्या, कहाँ, कब, क्यों और कैसे
कौन: किशोर कुणाल एक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं, जो बिहार के चर्चित बॉबी हत्याकांड की जांच में शामिल थे।
क्या: बॉबी हत्याकांड में किशोर कुणाल ने एक ऐसा कदम उठाया जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल था, उन्होंने कथित तौर पर बॉबी के शव को कब्र से निकालकर सच्चाई का पता लगाने का प्रयास किया।
कहाँ: यह घटना बिहार में घटित हुई, जहां बॉबी को दफनाया गया था।
कब: यह मामला 8 मई 1983 की रात को हुआ था जब बॉबी की हत्या की गई थी।
क्यों: किशोर कुणाल ने यह कदम उठाया क्योंकि उन्हें इस मामले में गहरे रहस्य का आभास हुआ था और यकीन था कि शव की जांच से महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।
कैसे: अपनी किताब ‘दमन तक्षकों का’ में, किशोर कुणाल ने बताया कि कैसे उन्होंने बॉबी के शव को कब्र से निकालकर जांच की और इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप उन्हें महत्वपूर्ण सुराग मिले।
किशोर कुणाल का साहसिक प्रयास
किशोर कुणाल ने अपनी किताब में उल्लेख किया है कि जब उन्होंने बॉबी के शव को निकालने का निर्णय लिया, तो यह किसी सामान्य जांच की तरह नहीं था। उनके सामने कई चुनौतियाँ थीं, जिनमें से एक यह थी कि कोई भी सबूत सामने नहीं आ रहा था। उनके इस साहसिक कदम ने न केवल उन्हें बल्कि पूरे समाज को भी हिलाकर रख दिया। सीबीआई को इस मामले की जांच सौंपे जाने से पहले, उन्होंने अपना पूरा प्रयास किया था कि वे इस हत्या के रहस्य को उजागर कर सकें।
राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा
किशोर कुणाल ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि इस मामले में उन्हें राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा से कहा था कि यदि वे इस मामले में हस्तक्षेप करते हैं तो उनकी छवि को नुकसान होगा। इसके बावजूद, उन्होंने अपनी जांच जारी रखी और अंततः इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया।
बॉबी हत्याकांड का रहस्य
बॉबी हत्याकांड का मामला तब सामने आया जब उसकी संदिग्ध मौत की खबर मीडिया में आई। बॉबी, जो राजेश्वरी सरोज दास की दत्तक पुत्री थीं, की हत्या के बाद उसे दफनाया गया था। किशोर कुणाल ने अपनी जांच के दौरान यह पाया कि बॉबी की खूबसूरती की वजह से ही उसका नाम बॉबी रखा गया था, जो उस समय की एक प्रसिद्ध फिल्म का नाम था। इस केस ने न केवल पुलिस प्रशासन को चुनौती दी बल्कि पूरे बिहार में दहशत पैदा कर दी।
कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोण
किशोर कुणाल ने इस मामले को लेकर सामाजिक दृष्टिकोण भी व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में तात्कालिक न्याय की आवश्यकता होती है ताकि समाज में आपराधिक गतिविधियों पर नियंत्रण पाया जा सके। इसके साथ ही, इस केस ने यह भी साबित किया कि किस प्रकार सामाजिक दबाव और राजनीतिक हस्तक्षेप न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य
आज के समय में, जहां डिजिटल मीडिया का प्रभाव बढ़ा है, ऐसे मामलों की जांच और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। किशोर कुणाल का साहसिक कदम यह दर्शाता है कि सच्चाई की खोज में कभी-कभी हमें अनियमित तरीकों का सहारा लेना पड़ सकता है। कब्र से शव निकलवाने का उनका कदम इस बात का प्रमाण है कि कोई भी सच्चाई छुपाई नहीं जा सकती।

