राजनाथ सिंह ने सुरक्षा जरूरतों पर खर्च होने वाली राशि के अधिकतम उपयोग पर कहा है कि मजबूत रक्षा वित्त व्यवस्था ताकतवर सेना की रीढ होती है।
श्री सिंह ने बुधवार को यहां तीन दिन के रक्षा वित्त एवं आर्थिक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि कानूनी तथा प्रक्रिया आधारित रक्षा- वित्त फ्रेमवर्क परिपक्व शासन व्यवस्था का अटूट हिस्सा है क्योंकि इससे रक्षा क्षेत्र में हाेने वाले खर्च का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि इस तरह के फ्रेमवर्क में दिशा निर्देशों के अनुसार खर्च पर नियंत्रण , वित्त पेशेवरों की सलाह , लेखा परीक्षण एवं भुगतान की पुष्टि होनी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि रक्षा पर होने वाला खर्च आवंटित बजट के अनुरूप तो है ही इसमें राशि का भी पूरी तरह से सदुपयोग किया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सशस्त्र सेनाओं के पास रक्षा इकोसिस्टम का पुख्ता तंत्र तो होना ही चाहिए साथ में अनुसंधान एवं विकास संगठनों , उद्योगों , सैनिक कल्याण संगठन आदि का भी सहयोग होना चाहिए।
रक्षा मंत्री ने कहा कि रक्षा व्यय में धन के पूर्ण मूल्य की आर्थिक अवधारणा को लागू करना मुश्किल है, क्योंकि इस क्षेत्र में, कोई दिखाई देने वाला राजस्व प्रवाह नहीं है तथा कोई आसानी से पहचाने जाने योग्य लाभार्थी नहीं हैं। खर्च किए गए धन के मूल्य का सदुपयोग अधिकतम करने के लिए, उन्होंने जोर देकर कहा कि रक्षा खरीद में खुली निविदा के माध्यम से प्रतिस्पर्धी बोली के नियम का पालन किया जाना चाहिए।
श्री सिंह ने कहा,“पूंजीगत या राजस्व मार्ग के तहत रक्षा प्लेटफार्मों एवं उपकरणों की खरीद के मामले में खुली निविदा की आदर्श व्यवस्था को यथासंभव अपनाया जाना चाहिए। एक प्रतिस्पर्धी बोली आधारित खरीद प्रक्रिया, जो सभी के लिए खुली है, खर्च किए जा रहे सार्वजनिक धन के पूर्ण मूल्य को यथार्थ रूप देने का सबसे अच्छा संभव तरीका है। कुछ दुर्लभ मामलों में खुली निविदा प्रक्रिया संभव है। इस तरह के उदाहरण अपवाद के तहत आने चाहिए और इन्हें अपवाद नियम नहीं बनना चाहिए।”
श्री सिंह ने जोर देकर कहा कि सेना, नौसेना, वायु सेना, रक्षा अनुसंधान संगठनों आदि जैसे रक्षा प्रतिष्ठानों को रक्षा वित्त और अर्थशास्त्र के लिए समर्पित विशिष्टता प्राप्त एजेंसी की आवश्यकता है । उन्होंने कहा कि भारत में यह काम वित्तीय सलाहकार (रक्षा सेवा) के नेतृत्व में रक्षा लेखा विभाग द्वारा किया जा रहा है।
रक्षा मंत्रालय (वित्त) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय सम्मेलन में अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, बांग्लादेश और केन्या सहित भारत और विदेशों के प्रख्यात नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों और सरकारी अधिकारी हिस्सा ले रहे हैं ।

