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Wednesday, January 21, 2026

मौलाना आज़ाद उर्दू यूनिवर्सिटी के चांसलर ने यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की याचिका

इंडियामौलाना आज़ाद उर्दू यूनिवर्सिटी के चांसलर ने यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की याचिका

याचिकाकर्ता फिरोज़ अहमद ने याचिका में कहा है कि लैंगिक न्याय, लैंगिक समानता और महिलाओं की गरिमा को महफ़ूज़ करने के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता की ज़रूरत है.

नई दिल्ली: यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) को लेकर हैदराबाद स्थित मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के चांसलर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है. याचिकाकर्ता फिरोज़ बख्त अहमद स्वतंत्रता सेनानी और भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद के पोते हैं.

पिटिशन में केंद्र को यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई है. याचिका में कहा गया है कि लैंगिक न्याय, लैंगिक समानता और महिलाओं की गरिमा को महफ़ूज़ करने के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता की ज़रूरत है.

इसमें कहा गया है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड का मसौदा तैयार करने के लिए केंद्र सीधे न्यायिक आयोग या उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन करे.

याचिकाकर्ता फिरोज़ बख्त अहमद ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपनी लंबित याचिका को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग की है. याचिका में कहा गया है कि विवाह की न्यूनतम आयु, तलाक़ के आधार, भरण-पोषण- गुज़ारा भत्ता, दत्तक-अभिभावकता, उत्तराधिकार विरासत में विसंगतियों को दूर करने की आवश्यकता है.

पितृसत्तात्मक रूढ़ियों (patriarchal stereotypes) पर आधारित भेद-भाव का कोई वैज्ञानिक समर्थन नहीं है. महिलाओं के खिलाफ़ असमानता को बढ़ावा देने और वैश्विक प्रवृत्तियों के खिलाफ होना चाहिए.

भारत में आपराधिक क़ानून एक समान हैं और सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे उनकी धार्मिक मान्यताएं कुछ भी हों लेकिन सिविल कानून आस्था से प्रभावित होते हैं और इसकी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.

श्री अहमद ने डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को उद्धृत किया और कहा कि यूसीसी को संविधान में एक “वांछनीय” कदम के रूप में शामिल किया गया था, लेकिन फिलहाल “स्वैच्छिक”.

याचिका में कहा गया है, “इसे संविधान में एक ऐसे पहलू के रूप में शामिल किया गया था जो तब पूरा होगा जब राष्ट्र इसे स्वीकार करने के लिए तैयार होगा और यूसीसी को सामाजिक स्वीकृति दी जा सकेगी।”

हालांकि, याचिका में तर्क दिया गया है कि यूसीसी महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों सहित कमजोर वर्गों को “एकता के माध्यम से राष्ट्रवादी उत्साह को बढ़ावा देते हुए” संरक्षण प्रदान नहीं करेगा।

श्री अहमद कहते हैं, “जब यह संहिता लागू होगी तो यह उन कानूनों को सरल बनाने का काम करेगी जो वर्तमान में हिंदू विधेयक, शरिया कानून और अन्य जैसे धार्मिक विश्वासों के आधार पर अलग-अलग हैं, यह कोड विवाह समारोहों, विरासत, उत्तराधिकार के आसपास के जटिल कानूनों को सरल करेगा, गोद लेना और उन्हें सभी के लिए एक बनाना. समान नागरिक कानून सभी नागरिकों पर लागू होगा, चाहे उनकी आस्था कुछ भी हो.”

याचिकाकर्ता फिरोज अहमद स्वतंत्रता सेनानी अबुल कलाम आजाद के पोते हैं.

श्री अहमद ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर अपनी याचिका में कहा है कि भारत में आपराधिक कानून एक समान हैं और सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे उनकी धार्मिक मान्यताएं कुछ भी हों, नागरिक कानून आस्था से प्रभावित होते हैं और इसकी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्री स्टाफ के अनुसार, याचिका पर 10 दिनों की अवधि के भीतर सुनवाई के लिए आने की संभावना है.

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