बादशाह हों या राजा आम तौर पर उनका धर्म से कुछ लेना देना नहीं होता है। अपने राज्य के विस्तार और सत्ता पर बने रहने के अलावा उनका कोई उद्देश्य नहीं होता है।
पिछले भाग में मैं ने हज़रत अली की बेटी हज़रत रुक़ैय्या बिन्ते अली के भारत आगमन के बारे में कुछ जानकारी आप तक पहुंचाने का वादा किया था तो आप को बताना चाहता हूँ कि पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद के दामाद और ख़लीफ़ा हज़रत अली के बेटे और पैगंबर साहिब के सगे नवासे हज़रत इमाम हुसैन को जब कर्बला के मैदान में सीरिया के शासक यज़ीद की विशाल सेना ने घेरा तो हज़रत इमाम हुसैन के साथ महिलाओं और बच्चों के अलावा केवल 72 पुरुष थे। इमाम हुसैन को घेरने का एक मात्र कारण यह था कि इमाम हुसैन यज़ीद को एक इस्लामी शासक के रूप में मान्यता देने पर राज़ी नहीं थे। यज़ीद की विशाल सेना ने इमाम हुसैन और उनके साथियों को घेर कर शहीद किया और युद्ध समाप्त होने के बाद यज़ीदी सेना घोड़ों पर बैठ कर इमाम हुसैन के शिविरों में घुस गई और लूटमार करने के बाद शिवरों में आग लगा दी, इस हंगामे दौरान कई बच्चे डर कर जंगल की तरफ़ निकल गए।
यज़ीद के सैनिकों ने शिविरों को जलाने के बाद पैगंबर हज़रत मोहम्मद की सगी नवासियों समेत हज़रत हुसैन के परिवारजनों को बंदी बना लिया।
कहा जाता है कि हज़रत अली की एक अन्य बेटी रुक़ैय्या के दो बच्चे इस हंगामे के दौरान गुम हो गए थे। ध्यान रहे कि हज़रत रुक़ैय्या बिन्ते अली की शादी हज़रत अली के भतीजे हज़रत मुस्लिम बिन अक़ील से हुई थी और उनके चार पुत्र थे। दो पुत्र अपने पिता के साथ कर्बला की घटना से पहले कूफ़ा गए थे जहाँ हज़रत मुस्लिम और दोनों बच्चों को शहीद कर दिया गया था। दो बच्चे अपनी माँ (हज़रत रुक़ैय्या) के साथ कर्बला में थे जो शिवरों में सेना घुसने के बाद गुम हो गए थे। जब हज़रत इमाम हुसैन के परिवार को जेल से रिहा किया गया और सब लौट कर मदीना आए तो हज़रत मुस्लिम के दोनों लापता बच्चों के भारत में होने की सूचना मिली जिसके बाद हज़रत रुक़ैय्या अपने कुछ परिवारजनों, हज़रत मुस्लिम की बहनों और अपनी बेटियों के साथ भारत की ओर चल दीं और (अखंड) भारत के शहर लाहौर तक पहुंच गईं मगर बच्चों का कहीं पता नहीं चला और फिर वहीं रहस्मय परिस्थितयों में उन सब की मौत हो गई। बाद में पंजाब के शासक के पुत्र कुमार विक्रम साही ने उनकी क़ब्रों पर एक मज़ार बनवा दिया हज़रत रुक़य्या का भारत वासियों ने इतना सम्मान किया कि उनका नाम लेने के बजाये उनको बीबी पाक दामन कहना शुरू कर दिया जिस के बाद उनका मज़ार लाहौर की जनता की श्रद्धा का केंद्र बन गया।
उनके अलावा भी भारत में मुसलसल मुसलमान शरण लेते रहे । भारत के सीमावर्ती राज्यों बिलोचिस्तान, सिंध और पंजाब में अनेक ऐसे मुसलमानों के आने के एतिहासिक प्रमाण मिलते हैं जिनको भारत के राजाओं ने शरण दी। जब बनी उमय्या के क्रूर शासक हजाज बिन युसूफ के युग में मकरान प्रान्त में बग़ावत करके वहां के अमीर की हत्या करने वाले एक अरब सरदार मोहम्मद अलाफ़ी ने अपने साथियों सहित सिंध के शासक राजा दाहिर के राज्य में शरण ली तो राजा दाहिर ने मोहम्मद अलफ़ी को न सिर्फ यह कि शरण दी बल्कि अलाफ़ी और उसके साथियों को अपनी सेना में भी शामिल किया , जिस से पता चलता है कि हिन्दू मुस्लिम रिश्ते कितने अच्छे थे। बाद में बनी उमय्या के शासकों ने राजा दाहिर पर दूसरे इलज़ाम लगा कर अपने एक सेनापति मोहम्मद बिन क़ासिम द्वारा हमला करवा दिया और एक बड़े क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर लिया। कुछ लोग इस को इस्लाम और हिन्दू धर्म का युद्ध बताते हैं जबकि यह युद्ध धर्म के नाम पर नहीं लड़ा गया था बल्कि एक हिन्दू राजा द्वारा कुछ मुसलमानों को शरण देने के खिलाफ बनी उमय्या का एक सैनिक अभियान था।
बनी उमय्या ने तो पैगंबर साहिब के नवासे हज़रत इमाम हुसैन समेत कितने पवित्र लोगों को क़त्ल किया और खुद मुसलमानों के विरूद्ध इतने अभियान छेड़े कि बनी उमय्या का पूरा इतिहास रक्त रंजित दिखाई देता है। इसी तरह खुद राजा दाहिर ने भी भारत के अन्य प्रदेशों के शासकों से कई लड़ाइयां लड़ीं जिस में बहुत खून ख़राबा हुआ। यहां पर एक बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि पाकिस्तान में काफी दिनों से सिंधी मुसलमान इस बात की मांग कर रहे हैं कि राजा दाहिर की मूर्ति भी लगवाई जाए। जिस से सिद्ध होता है कि राजा दाहिर से मुसलमानों को कितना प्यार था।
बादशाह हों या राजा आम तौर पर उनका धर्म से कुछ लेना देना नहीं होता है। अपने राज्य के विस्तार और सत्ता पर बने रहने के अलावा उनका कोई उद्देश्य नहीं होता है।इस लिए किसी बादशाह, शहंशाह या राजा के किसी सैन्य अभियान को धर्म से जोड़ना बिलकुल ग़लत है। बादशाह अच्छे भी हुए और बुरे भी ,रहम दिल भी थे और क्रूर भी, नमाज़ पढ़ने वाले भी थे और शराबी कबाबी भी,इस लिए किसी बादशाह, शहंशाह या राजा के किसी सैन्य अभियान को धर्म से जोड़ना बिलकुल ग़लत है।
ध्यान रहे कि जब पैगंबर साहब ने धर्म के प्रचार प्रसार के साथ साथ इस्लामी हुकूमत की बागडोर संभाली तो बिलकुल नई शासन प्रणाली दुनिया के सामने पेश की। अगले अंक में हम इस्लामी शासन प्रणाली और राजशाही के बीच का फ़र्क़ समझायेंगे। (जारी)

