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Wednesday, January 21, 2026

हुसैनी ब्राह्मण: इमाम हुसैन के साथ सुनील दत्त परिवार के संबंध का एक दिलचस्प ऐतिहासिक तथ्य

इंडियाहुसैनी ब्राह्मण: इमाम हुसैन के साथ सुनील दत्त परिवार के संबंध का एक दिलचस्प ऐतिहासिक तथ्य

प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता सुनील दत्त इमाम हुसैन के प्रति अपनी और अपने पूर्वजों की भक्ति को अत्यंत सम्मान के साथ व्यक्त करते थे।

हम आपको पिछले भागों में बता चुके हैं कि भारत और अरब देशों के बीच व्यापारिक संबंध इस्लाम के उदय से पहले ही से क़ायम थे इस्लाम का उदय होने के बाद इन संबंधों में घनिष्टता बढ़ती गई। भारत के व्यापारी वहाँ जाते थे और अरब के व्यापारी यहाँ आते थे। इसी क्रम में भारत के पंजाब प्रदेश के ब्रह्मण परिवार के व्यापारी हज़रत मोहम्मद के युग में मदीना शहर गए।

इन व्यापारियों के नेता राहिब दत्त नाम के एक भारतीय थे। राहिब दत्त का कोई पुत्र नहीं था। वह एक दिन हज़रत मोहम्मद के पास गए और उनसे निवेदन किया कि वह उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दें, कहा जाता है कि हज़रत मोहम्मद ने पास में ही खेल रहे अपने नाती (नवासे) हज़रत इमाम हुसैन से कहा कि वह राहिब दत्त के लिए हाथ उठा कर दुआ करें, जिस के बाद इमाम हुसैन ने अपने नन्हे नन्हे हाथ उठा कर दुआ की तो राहिब दत्त को पुत्र की प्राप्ति हुई। इसी वरदान के बाद दत्त परिवार ने खुद को हुसैनी ब्राह्मण कहना शुरू किया।

जब 680 ई ० में कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन को घेर कर शहीद किये जाने की खबर मिली तब भारत से हुसैनी ब्रह्मणों का 700 सैनिकों वाला एक सैन्य दस्ता ईराक़ के लिए रवाना हुआ और इन बहादुर सेनानियों ने हज़रत मुख़्तार बिन अबी उबैद सक़फ़ी की सेना के साथ मिल कर यज़ीदी सेना से युद्ध किया और यज़ीद के उन सैनिकों (जिन्होंने हज़रत इमाम हुसैन और उनके परिवारजनों पर अत्याचार किये थे) को चुन चुन कर मारने में हज़रत मुख़्तार का साथ दिया। ईराक़ से वापस आने के बाद इन लोगों ने मोहर्रम के दिनों इमाम हुसैन की याद में मजलिस (स्मृति सभा) व लंगर इत्यादि का आयोजन करना शुरू किया जो आज तक दत्त परिवार के लोग किया करते हैं।

प्रसिद्ध फ़िल्म कलाकार सुनील दत्त का समबन्ध भी राहिब दत्त के परिवार से ही था, वह अपने और अपने पूर्वजों के इमाम हुसैन के प्रति आदर का ज़िक्र अनेक अवसरों पर किया करते थे। हमारा देश अपनी जिन ऊँची परम्पराओं के लिए मशहूर रहा है हुसैनी ब्रह्मणों द्वारा इमाम हुसैन की याद में आयोजन करना उसी का बेहतरीन नमूना है। ख़ास बात यह है कि दत्त परिवार के लोगों ने अपना धर्म नहीं छोड़ा और हिन्दू रहते हुए ही दुनिया को यह बता दिया कि मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं ।

यह सोचने की बात है कि यज़ीद की सेना मुसलमानों पर आधारित थी फिर भी उस ने अपने ही पैगंबर के परिवार पर अत्याचार करने में कोई शर्म नहीं की क्योंकि उसके लिए धर्म नहीं सत्ता ज़्यादा अहम थी जबकि हुसैनी ब्रह्मणों का धर्म अलग था मगर उन्होंने सत्य का साथ देने का फैसला किया।

बनी उम्मया की सत्ता के आख़री कुछ वर्षों में बनी अब्बास कहे जाने वाले क़बीले ने उनके विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया जिसके कारण पूरे देश में अशांति फैल गई और आम नागरिक देश छोड़ छोड़ कर आस पास के देशों में शरण लेने लगे। 750 ई ० में बनी उम्मया को बनी अब्बास ने सत्ता से बेदख़ल कर दिया। जब बनी अब्बास ने अपनी हुकूमत बनाई तो अपने विरोधियों को उन्होंने भी बहुत प्रताड़ित किया जिसके कारण अरब और ईरान से बड़ी संख्या में मुसलमान भारत में शरण लेने के लिए आने लगे। चूँकि भारत में अलग अलग राज्य थे और हर शासक स्थानीय तौर पर अपने क्षेत्र में बसने वाले लोगों पर निगाह रखता था। किसी भी शासक को शांतिपूर्ण ढंग से देश में आने वालों से कोई कष्ट नहीं था।

पैगंबर हज़रत मोहम्मद के वंशज और शिया वर्ग के आठवें इमाम हज़रत अली रज़ा को जब अब्बासी सलतनत के दौरान ज़हर देकर शहीद कर दिया गया तो 9 वीं शताब्दी की शुरआत उनके एक पुत्र हज़रत अली वली अपने परिवारजनों के साथ ईरान के मशहद नगर से पलायन कर के भारत आ गए और पटियाला के पास एक गावं में रुके। पटियाला उस समय थानेसर के राजा के आधीन था राजा ने अपने सिपाहियों को भेज कर मालूम किया कि कौन लोग आये हैं तो सिपाहियों ने बताया कि ईरान से आये हुए कुछ शरणार्थी हैं जिनके साथ औरते और बच्चे भी हैं। तब थानेसर के शासक ने उनको वहीं रहने दिया जिसके बाद उन्होंने आस पास के लोगों से ज़मीन ख़रीद कर वहीँ रहना शुरू किया और एक नया गाँव बसाया जिस का नाम उन्होंने अपनी माता हज़रत समाना के नाम पर समाना रखा (समाना पटियाला से 28 किलो मीटर दूर स्थित है)।

ख़ास बात यह है कि 1947 के दंगों के बाद समाना में कोई मुसलमान नहीं बचा था सब या तो पाकिस्तान चले गए या मारे गए मगर वहाँ के हिन्दुओं और सिखों ने हज़रत अली वली की दरगाह के पूरे पचास वर्ष तक देख रेख की और फिर 2003 में यह दरगाह पंजाब के मुस्लिम वक़्फ़ बोर्ड को सौंप दी जहाँ अब मजलिसों और महफ़िलों के कार्यक्रम होते हैं। हज़रत अली वली की दरगाह उन लोगों के लिए भी एक जवाब है जो यह कहते हैं कि भारत में इस्लाम विदेशी आकर्मणकारियों के साथ आया। हमारा कहना है कि भारत में इस्लाम वह लोग अपने साथ लाये जो शांतिपूर्ण तरीक़े से यहाँ आये और इस महान देश को अपना घर मान कर यहीं रहने लगे। वैसे भी उस ज़माने में पलायन बहुत आसान था क्योंकि किसी भी देश में दाख़िल होने के लिए वीज़ा और पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं थी । इसी कारण मुसलमान भारत में आबाद होते गए । (जारी)

1 – पहला भाग

2 – दूसरा भाग

3 – तीसरा भाग

4 – चौथा भाग

5 – पांचवां भाग

6 – छठा भाग

7 – सातवां भाग

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